राजनांदगांव से तेजकरण जैन की कविता – झुर्रियां

झुर्रियां

झुर्रियां
नहीं सिर्फ सलवटें
निबंध है,जिंदगी का
कितनी बदली है करवटें
सुख-दुख के थपेड़े
उभर आते हैं,बनकर
छाप, मुहर सी झुर्रियां
अनकहे प्रश्नों का उत्तर
गुजरे बीते संघर्ष
अतीत की मौन
कहानी है, झुर्रियां
टूटते,दुखते,झुकते शरीर के
मौत का पैगाम
एक संदेशा है झुर्रियां
कोई तो है
जो पढ़ता, समझता, कुरेदता है
झुर्रियां
और समेटता झुर्रियों के अनुभव
संवारता अपना जीवन
बनता है झुर्रियों का
हमदम,हरदम,मरहम

तेजकरण जैन
491666
राजनांदगाँव
छत्तीसगढ़

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