Devendra Soni September 11, 2019

यह समर्पित है उन्हें जो अपने परिवार से दूर है।

टुकड़ों में बँटा मन

चल रहा था जीवन अपना
देख रहे थे हम सपना
आगे तो है यह करना
नहीं कठिन अब डगर अपना
एक दिन पैगाम आया
छोड़ कर घर दूर आया
पत्नी बच्चा और माँ पिता
छोड़कर है मन रोता
क्या है जीवन बिन परिवार
काटने दौड़ता शनिवार और रविवार
जिसका रहता था इंतजार
अब लगता नहीं आए यह दिन
मन तड़पता जैसे मछली जल बिन
रात दिन लगे सूने सूने
मन नहीं कुछ और सुने
टुकड़ों में है मन बँटा
मन से कुछ नहीं हटा
मन मे भावों का है बाढ़ बना
मन कुछ और सोचने से कर रहा मना
मन है टुकड़ों में बँटा
मन है टुकड़ों में बँटा॥

राजीव रंजन शुक्ल,पटना

3 thoughts on “पटना से राजीव रंजन शुक्ल की कविता – टुकड़ों में बंटा मन

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