रांगेय राघव : हिंदी के शेक्सपियर… पुण्यतिथि पर विशेष आलेख-डाॅ अनिल उपाध्याय, टूण्डला ( फिरोजाबाद)

रांगेय राघव :

हिंदी के शेक्सपियर…
पुण्यतिथि पर विशेष

17 जनवरी 1923 को आगरा में जन्मे डाॅ. रांगेय राघव हिंदी के उन महान और प्रतिभावान लेखकों में से एक थे जो इस धरा पर ‘शाॅर्ट वीजा’ लेकर अवतरित हुए थे लेकिन महज 39 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने एक उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि, इतिहासवेत्ता तथा रिपोर्ताज लेखक के रूप में स्वयं की एक विशिष्ट पहचान बनाई। गैर हिंदी भाषी होते हुए भी डाॅ. रांगेय राघव ने हिंदी साहित्य के विभिन्न धरातलों पर युग- सत्य से उपजा महत्त्वपूर्ण साहित्य रचा।

हिंदी के शेक्सपीयर के नाम से विख्यात रांगेय राघव मूल रूप से तमिल भाषी थे। उनका परिवार लगभग 300 वर्ष पहले आंध्र प्रदेश से आकर भरतपुर जिले के वैर कस्बे में बस गया था। रांगेय राघव की शिक्षा-दीक्षा आगरा में हुई। उन्होंने 1944 में सेंट जाॅन्स कालेज से स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1949 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. की डिग्री हासिल की। रांगेय राघव का मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था। उन्होंने अपना साहित्यिक नाम रांगेय राघव रखा। उनके पिता का नाम रंगाचार्य और माता कनकवल्ली थी। इनका विवाह सुलोचना जी से हुआ था।

रांगेय राघव की शब्द -यात्रा महज 13 वर्ष की उम्र में शुरू हुई। उन्होंने शुरुआती दौर में कविताएँ लिखीं । इसे संयोग ही कहा जाएगा कि उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति का अंत भी मृत्यु पूर्व लिखी गई उनकी एक कविता से ही हुआ। यह सच है कि उनकी शब्द – यात्रा भले कविता से शुरू हुई लेकिन उन्हें प्रसिद्धि मिली एक गद्य लेखक के रूप में। सन् 1946 में प्रकाशित ‘घरौंदा’ उपन्यास के जरिए वे प्रगतिशील कथाकार के रूप में चर्चित हुए। उनकी कहानी ‘गदल’ बहुत प्रसिद्ध हुई और इसका अनुवाद कई विदेशी भाषाओं में हुआ। 1942 में बंगाल में पड़े अकाल पर लिखी गई रांगेय राघव की रिपोर्ट ‘तूफानों के बीच’ काफी चर्चित रही। ‘तूफानों के बीच’ अपनी विशिष्ट वर्णन शैली और व्यापक मानवीय सरोकारों के चलते बेहद लोकप्रिय हुआ । रांगेय राघव ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘बंगाल का अकाल मानवता के इतिहास का बहुत बड़ा कलंक है। शायद क्लियोपेट्रा भी धन के वैभव और साम्राज्य की लिप्सा में अपने गुलामों को इतना भीषण दुख नहीं दे सकी जितना आज एक साम्राज्य और अपने ही देश के पूँजीवाद ने बंगाल के करोड़ों आदमी, औरतों और बच्चों को भूखा मारकर दिया है। आगरे के सैकड़ों मनुष्यों ने दान नहीं, अपना कर्तव्य समझकर एक मेडिकल जत्था बंगाल भेजा था। जनता के इन प्रतिनिधियों को बंगाल की जनता ने ही नहीं, वरन् मंत्रिमंडल के सदस्यों तक ने धन्यवाद दिया था। किन्तु मैं जनता से स्फूर्ति पाकर यह सब लिख सका हूँ। मैंने यह सब आँखों-देखा लिखा है।’

डाॅ रांगेय राघव ने कई विदेशी भाषाओं, जैसे जर्मन और फ्रांसीसी साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। रांगेय राघव द्वारा किया गया शेक्सपियर की रचनाओं का हिंदी अनुवाद मूल रचना-सा प्रतीत होता है जिसके कारण उन्हें ‘हिंदी के शेक्सपीयर’ की संज्ञा दी गई।

भरतपुर जिले के वैर कस्बे को रांगेय राघव ने अपनी साहित्य साधना स्थली बनाया। वहाँ का प्राकृतिक वातावरण व ग्रामीण परिवेश उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने वैर में ही बसने का निर्णय लिया। वैर भरतपुर महाराजा के क़िले के कारण तो प्रसिद्ध है ही, परन्तु वहाँ तमिलनाडु के स्वामी रंगाचार्य का दक्षिण शैली का सीतारामजी का मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है जिसमें रांगेय राघव के बड़े भाई महंत रहे थे । मंदिर की शाला में बिल्कुल तपस्वी जैसा जीवन व्यतीत करने वाले रांगेय राघव ने साहित्य की साधना की। नारियल की जटाओं के गद्दे पर लेटे-लेटे और अपने पैर के अँगूठे में छत पर टंगे पंखे की डोरी को बाँधकर हिलाते हुए वह घंटों तक साहित्य की विभिन्न विधाओं और अयामों के बारे में सोचते रहते थे।

रांगेय राघव ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लगभग 150 पुस्तकें लिखीं। उनके संबंध में एक बात कही जाती थी कि, ‘जितने समय में कोई पुस्तक पढ़ेगा उतने समय में वे पुस्तक लिख सकते थे। उन्हें पुस्तक की रूपरेखा बनाने में समय लगता था, लिखने में नहीं।‘ रांगेय राघव सामान्य जन के ऐसे रचनाकार थे जो प्रगतिवाद का लेबल चिपकाकर सामान्य जन का दूर बैठे चित्रण नहीं करते, बल्कि उनमें बसकर करते हैं। समाज और इतिहास की यात्रा में वे स्वयं सामान्य जन बन जाते हैं। रागेय राघव ने वादों के चौखटे से बाहर रहकर सही मायने में प्रगितशील रवैया अपनाते हुए अपनी रचनाधर्मिता से समाज संपृक्ति का बोध कराया। समाज के अंतरंग भावों से अपने रिश्तों की पहचान करवाई।

डाॅ रांगेय राघव को सिगरेट पीने का बहुत शौक था। ‘जानपील’ उनका पसंदीदा ब्रांड था। दूसरी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाते। उनके कमरे में मेज पर हमेशा सिगरेट की कई डिब्बियाँ रखी रहती थीं और कमरे से सिगरेट की गंध आती थी। कमरा हमेशा धुएँ से भरा रहता था। सिगरेट उनके जीवन की आवश्यकता बन गई थी जिसके बिना वह कुछ भी करने में असमर्थ थे। सिगरेट की लत के चलते उन्हें कैंसर हो गया। 12 सितंबर 1962 को यह महान शब्द- शिल्पी कैंसर से जीवन की जंग हार गया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘विषाद मठ’ , ‘उबाल’ , ‘राह न रुकी’ , ‘बारी बरणा खोल दो’ , ‘देवकी का बेटा’ , ‘यशोधरा’ ‘मेरी भव बाधा हरो’ , ‘कब तक पुकारूँ’ ,’पक्षी और आकाश’ , ‘चीवर’ , :आख़िरी आवाज़’,’ बन्दूक और बीन’ आदि शुमार हैं।

डाॅ अनिल उपाध्याय
97/5 “शांति विला” नई बस्ती, टूण्डला ( फिरोजाबाद) उत्तर प्रदेश
संपर्क : 9412815392

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