बानो सिमडेगा से नवीन कुमार नवेन्दु की रचना

मकानों के जंगल में आदमी खो रहा है,
सुबह कब की हो गई ,आदमी सो रहा है।

सूरज -चाँद रोज-रोज ही निकलते रहते हैं,
पर आदमी उससे चंद बातें कहाँ कर रहा है?

खेत और खलिहानों में जहर बोया हमने,
आदमी के मरने का दुःख कहाँ हो रहा है?

कंक्रीटों के कैक्टस फैले गाँव और शहर,
नदियाँ उदास हैं,पहाड़ भी आज रो रहा है।

पगडंडियाँ सड़के बनीं, टोले-मोहल्ले जुड़ें
मगर सफ़र में आदमी रोज घायल हो रहा है।

तिजोरियां भरने के लिए परेशान है आदमी,
आज रिश्ते-नाते कहाँ कोई निभा रहा है!

मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित
-नवीन कुमार ‘नवेंदु’
रा.म.वि.बानो सिमडेगा (झारखंड)

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