दतिया से जगदीश सुहाने का लेख – कर्म का फल भोगना ही होगा

कर्म का फल भोगना ही होगा

कर्म का फल भोगना ही होगा।
आज नहीं-कल!
अगले जन्म में!!
और अगले, और और अगले जन्म में!!!
यह कर्म-सिद्धान्त का निर्विवाद मत है।
यह ज्ञान शाब्दिक या मात्र बौद्धिक न रहे, व्यक्ति का अनुभव बन जाए तो पूरी सृष्टि में व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।
तब हम दुर्व्यवहार कैसे कर सकेंगे?हम डरेंगे कि इसका फल हमें भोगना पड़ेगा।पर ऐसा नहीं होता।क्योंकि कर्म और उसके फल के बीच समय का अन्तराल हो जाता है।जिससे व्यक्ति उन दोनों में कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं देख पाता।
दोनों में समय का अन्तराल रहना प्रकृति की व्यवस्था है।
प्रकृति का क्रम है।बीज क्रमशः अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित तब फलित होता है।फल होने और उसके पकने में भी अन्तराल रहता है।लेकिन फल उसी का होगा जिसका बीज था।आम के पेड़ में आम ही आएंगे, केले नहीं।
फिर अन्तराल की व्यवस्था भी सबकी एक सी नहीं है।कहा गया है:-
“अत्युग्र-पुण्य-पापानाम्
इहैव फलमश्नुते।”
ज्यादा उग्र सत्कर्म या विकर्म के फल यहीं(इसी जन्म में)मिल जाते हैं।अन्यथा

कथा आती है-माण्डव्य ऋषि को अपने एक कर्म का फल १००जन्मों के बाद मिला।
मिलेगा अवश्य :-
“अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि “॥
शिवपुराण ५.११.२
लेकिन आदमी समझता है कि वह बच जाएगा।
यदि ऐसा न समझता तो अनैतिक आचरण कैसे करता?
उसे लगता है कि वह समर्थ है, उसके सम्पर्क सूत्र सत्ता तक हैं।

हे राम!कितनी बड़ी गलतफहमी!!
तुम्हारे सत्ता में सूत्र होंगे, महाराज दशरथ स्वयं सत्ताधारी थे,वे स्वयं सत्ता थे।
राजा दशरथ- राजा नहीं, सम्राट!
ऐसे वैसे सम्राट नहीं-चक्रवर्ती सम्राट!!”ससुर चक्कवई कौसलराऊ”।
देवराज इंद्र भी उनका सम्मान करते हैं-
आगे होय जेहिं सुरपति लेई।
अर्ध सिंहासन आसन देई।।
कितने समर्थ ,शक्तिशाली और सुरक्षित हैं!
फिर इतने तपस्वी कि निराकार ब्रह्म को उनके कारण नराकार लेना पड़ता है।
वे सर्वसमर्थ ब्रह्म को अपना बेटा बनाकर गोद में खिलाते हैं।
दशरथजी हैं कहाँ?अयोध्या में ।
अपने शासित भूभाग के सर्वाधिक सुरक्षित स्थान(राजधानी)में।
राजधानी में भी सर्वाधिक सुरक्षित प्रासाद में।
प्रासाद में सबसे सुरक्षित स्थल रनिवास में।
रनिवास में भी अपनी उस प्राणप्रिया रानी(कैकेयी)के समीप जो उनके लिए अपने प्राण भी दॉव पर लगा सकती है।

लेकिन जब श्रवणकुमार की हत्या के कर्म -फल का परिपाववक हुआ तब उसने दशरथजी को वहीं पकड़ लिया, वहीं जकड़ लिया।
प्राणप्रिया रानी ही दशरथजी के उस कर्म-दण्ड (उनकी मृत्यु) का निमित्त बन गईं।

शुभेन कर्मणा सौख्यं,दु:खं पापेन कर्मणा।
कृतं फलति सर्वत्र-“नाकृतं भुज्यते क्वचित्”।।

जो भी दु:ख या सुख मिल रहा है, हमारे ही कर्मों का फल है।
लेकिन कर्म का फल कब मिलेगा, कहाँ मिलेगा-इसका ज्ञान न होने के कारण हमें भ्रम हो जाता है कि सब आकस्मिक(Accidental)घट रहा है।

आकस्मिक कुछ नहीं है।

कार्य-कारण-श्रृंखला है।इसलिए कर्म करते समय सजग रहें।धर्मानुसार आचरण करें।धर्म क्या है?

श्रूयतां धर्म-सर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मन:प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।

धर्म की इससे सरल परिभाषा नहीं है।धर्म की इससे आसान कसौटी नहीं है।
दूसरों के साथ वैसा व्यवहार न करें जैसा हम नहीं चाहते
कि कोई हमारे साथ करै।
“परस्परं भावयन्तः श्रेयःपरमवास्यथ।’
आपस में एक दूसरे सहयोग करते हुए परम श्रेय को प्राप्त करें।
यही सनातन धर्म है।
यही कर्म विपाक प्रक्रिया की शिक्षा है।

जगदीश सुहाने
दतिया(म०प्र०)

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