रायपुर से इंदिरा तिवारी की कविता – नशा

नशा

हमने देखा एक सिसकता हुआ घर
पैरों तले कुचली जाती हुई नारी
नशे में धुत्त लाल नेत्रों वाला पुरुष
सहमें माँ की आँचल तले छिपते हुए शिशु
अजब दास्ताँ है इन नशे बाजों की
जिन्हें न परवाह अपने घरों की
न ही मर्यादा न ही सम्मान की
जो कुछ अर्जित करते हैं यूँ ही लूटा देते हैं
न जाने क्या होगा भविष्य
इन घरों के नौनिहालों का!
बनेंगे पिता से या फिर
माँ के आँसू पोंछ पायेंगे?
समय कह रहा है नशे की राह छोड़ो
गर करना ही है नशा तो प्रेम का करो
प्रेम दो परिवार को
देश को समाज को
निखर उठेगी ज़िन्दगी
नमन करेगी ज़िन्दगी।

मौलिक एवं अप्रकाशित
इन्दिरा तिवारी
रायपुर-छत्तीसगढ़।

Please follow and like us:
0

1 Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*