Devendra Soni September 8, 2019

नशा

हमने देखा एक सिसकता हुआ घर
पैरों तले कुचली जाती हुई नारी
नशे में धुत्त लाल नेत्रों वाला पुरुष
सहमें माँ की आँचल तले छिपते हुए शिशु
अजब दास्ताँ है इन नशे बाजों की
जिन्हें न परवाह अपने घरों की
न ही मर्यादा न ही सम्मान की
जो कुछ अर्जित करते हैं यूँ ही लूटा देते हैं
न जाने क्या होगा भविष्य
इन घरों के नौनिहालों का!
बनेंगे पिता से या फिर
माँ के आँसू पोंछ पायेंगे?
समय कह रहा है नशे की राह छोड़ो
गर करना ही है नशा तो प्रेम का करो
प्रेम दो परिवार को
देश को समाज को
निखर उठेगी ज़िन्दगी
नमन करेगी ज़िन्दगी।

मौलिक एवं अप्रकाशित
इन्दिरा तिवारी
रायपुर-छत्तीसगढ़।

1 thought on “रायपुर से इंदिरा तिवारी की कविता – नशा

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