प्रयागराज से मीना पांडेय की ग़ज़ल-हां बदलने लगी हूं मैं अब।

हां बदलने लगी हूं मैं अब।

वक़्त का तकाज़ा था,बदलने लगी हूं अब।
शब्दों को माप तौल कर कहने लगी हूं अब।

अपेक्षा नहीं रखती किसी रिश्ते में।
सुकून की नींद मुझको ,
आने लगी है अब।

जबसे बहते हुए आंसुओ के निशान पोछे है।
आइने को भी पसंद आने लगी हूं अब।

भावनाओं में बहकर अब खुद को परेशान नहीं करती।
सीने में पत्थर सा कुछ रखने लगी हूं अब।

कोई मेरा है तो उसे परवाह मेरी भी होगी।
मैं भी कुछ लोगो को आजमाने लगी हूं अब।

खुद से कई सवाल करने लगी हूं अब।
हां बदलने लगी हूं मैं अब।

दिल से आज भी सबका ख्याल रखती हूं।
पर उनकी बेपरवाही कम असर करती है अब।

टूटकर अब तक सबका मान रखा है।
“ना” बोलने का फन सीखने लगी हूं अब।

सब पर छोड़ दिया है उनके फैसले का हक।
अपने पक्ष साबित करने की कोशिश छोड़ दी है अब।

लोगों की उठती उंगलियां असर नहीं करती मुझको।
मैं को दर्पण बनाकर अपने कर्मो का हिसाब रखने लगी हूं अब।

अपने लिए कुछ वक़्त चुरा ही लेती हूं।
कुछ गानों को गुनगुनाने लगी हूं अब।

चादर पे काढ़े गए कछ फूलों के साथ साथ मुस्कुराने लगी हूं अब ।
हां बदलने लगी हूं मैं अब।

जीती हूं इस तरह की आखिरी दिन हो अब।
जिंदगी एक ही बार मिलती है सबको खुद को समझाने लगी हूं अब

हां बदलने लगी हूं मैं अब।

मीना पांडेय
प्रयागराज,उत्तर प्रदेश

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