हलालपुर,हरियाणा से सरोज दहिया का व्यंग्य आलेख – दोपहर का भोजन

” दोपहर का भोजन” व्यंग्य

दोपहर के भोजन का हमारे लिए शुरू से ही महत्व रहा है, विवाह शादी पार्टियों में भी प्रितिभोज दोपहर में ही देने का रिवाज रहा, लेकिन पिछले दो दो-तीन दशकों से समारोह दिन की बजाय रात में करने का रिवाज चल पड़ा, मजबूरी, दिखावा या कुछ और, यह उन्हीं को पता जो समारोह के लिए अपनी रात काली पीली सफेद न जाने कैसी-कैसी कर जाते हैं । हां रात को बिजली की जगमगाहट और नये नये परिधानों में सुसज्जित स्त्री पुरुष मनमोहक नजारे पेश करने के साथ साथ मोहिनी मन्त्र फूंक देने में भी यदा-कदा कामयाबी हासिल कर ही लेते होंगे ।
दोपहर का प्रितिभोज अब गुजरे जमाने की बात बन चुका, यादाश्त बनाये रखने के लिए एक दूरदर्शी सरकारी योजना चालू की गई, लगभग बाईस चौबीस साल पहले, जो आज तक चली आ रही है, बंद करेगा कौन, कोई भी राजनीतिक पार्टी इतनी बुद्धु नहीं है कि अपने लाभ की योजना को बंद कर दें, यह नेता हितकारी योजना जिसे “दोपहर का भोजन” नाम दिया गया है ।
इस योजना के तहत कक्षा एक से आठवीं तक के प्रत्येक छात्र को सरकारी स्कूलों में दोपहर का खाना दिया जाता है ।
सुबह प्रार्थना होते ही राशन जुलाई काम शुरू, स्कूल के सबसे मेहनती और ईमानदार अध्यापक के हाथ में चार्ज होता है राशन का, पढ़ाई छुट जाये क्या हानि, सरकारी राशन में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए, पढ़ाई के निरीक्षण के लिए अधिकारी आजकल स्कूलों में कभी नहीं आते रिवाज खत्म, हां राशन का रिकॉर्ड चैक करने के लिए तो स्कूलों में जरुर आना होता है, क्यों कि राशन सरकार देती है, पढ़ाई खत्म करने के तौर तरीकों की चढ़त पर पढ़ाई के निरीक्षण की जरूरत ही क्या ?
यदि भोजन की जगह पढ़ाई की गुणवत्ता पर सरकार ध्यान दें तो बताइए कौन सा लाभ ? हानि ही हानि, यदि गरीब पढ़ गया तो भीड़ कौन बनेगा, भीड़ कायम रखने के लिए टुकड़ा फैंकना ही लाभदायक, मां बाप खुश, बच्चे खुश, नेताओं की मजबूती, मूर्खों का राजा बनने का लुत्फ !!
भारत की संस्कृति सुरक्षा का ढोल पीटने वालो यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधारने के साथ साथ व्यवसायिक शिक्षा लागू करके तो देखो, युवा पीढ़ी का भटकाव छूमंतर न हो जाये तो कहना ।
बड़े घरों के बच्चे कांवैन्ट में पढ़ते हैं, अंग्रेजी बोलते हैं, विदेश में शिक्षा पाते हैं, मिडिल क्लास उनकी नकल करना चाहते हैं, जुट रहे हैं अभिभावक, बच्चों को बड़ा बनाने में, बिक रही हैं जमीन, कर्ज का बोझ, क्या यह ही पैमाना है देश के विकास का ?
सबसे गरीब खा रहे हैं स्कूलों में दोपहर का भोजन ताकि देश में लोकतंत्र- वोटतन्त्र-भीड़तन्त्र कायम रहे, काम न देकर, शिक्षा न देकर, जागरूकता न फैला कर, भिखारी तैयार करना, वाह रे नेता तन्त्र !
सत्ता पर काबिज होने का अचूक फॉर्मूला, गरीब नहीं रहेगा, भिखारी नहीं रहेगा वोट कौन देगा आंख मूंद कर, एक दिन की दिहाड़ी के बदले चार छ घंटे रैलियों में भीड़ कहां से आयेगी, गरीब बहुत जरूरी है लोकतंत्र बचाने के लिए, भीड़ पड़ी पर ये ही काम आते हैं और इन्हीं के बच्चे खुश होकर खाते हैं, ” दोपहर का भोजन” ।
सरोज दहिया, हलालपुर

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