नागपुर से फिरोज खान की ग़ज़ल


ग़ज़ल

तन्हाई हो, आराम हो,
बस हम-तुम हों, और शाम हो ! – 1

इस बार बिछड़ने से पहले,
कई बार वो बिछड़ा था मुझसे ! – 2

फ़िर लौट मेरी चिट्ठी आई,
वो घर अब उसका पता नहीं ! – 3

सब ख़ताएँ तो ‘अल्फ़ाज़’ की ही नहीं,
जैसी सोहबत थी वैसी अक़ल हो गई ! – 4

उनको ख़ुश देख कर हम ज़रा जल गए,
हमको लगता था हम दिल-जले ही नहीं ! – 5

वालिद के जैसा बन जाऊँगा,
उस दिन मैं फ़रिश्ता बन जाऊँगा ! – 6

तुम एक नई सड़क जैसी,
और मैं एक शहर पुराना सा ! – 7

ये कह के उसने ठुकराया,
शायर है, शायद पागल है ! – 8

वो ग़ज़ल जिसको ‘अल्फ़ाज़’ मिल न सके,
रोज़ सोचा किए, पर सुनाई नहीं ! – 9

न पीर से मिलती है, न पयम्बर से मिलती है,
सच्ची दुआ तो अपने ही घर से मिलती है ! – 10

जब काम न मिले तो रोटी नहीं मिलती,
भूख की नौकरी में छुट्टी नहीं मिलती ! – 11

©® फिरोज खान अल्फ़ाज़
नागपुर , प्रोपर औरंगाबाद बिहार

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