कालिमा के गाल पर लालिमा मलता रहूँ- टूण्डला,फिरोजाबाद से डॉ.अनिल उपाध्याय

*कालिमा के गाल पर लालिमा मलता रहूँ*

शिक्षक दिवस पर विशेष:

महान शिक्षाविद्, दार्शनिक एवं राजनयिक डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितंबर प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। शिक्षक को राष्ट्र का निर्माता, शिल्पकार कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान अनादि काल से पूजनीय एवं सर्वोपरि रहा है। हमारे शास्त्रों व धर्म ग्रंथों में गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है :

गुरु गोविंद दोऊ खड़े का के लागूँ पाँय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।

गुरु की महिमा का वर्णन करते यहाँ तक कहा गया है कि यह तन विष की लता के समान है और गुरु अमृत के समान। अगर शीश देकर भी सद्गुरु मिलता हो तो भी यह सौदा सस्ता ही है। गुरु की महिमा का बखान करते हुए कबीर दास जी कहते हैं :

सब धरती कागज करूँ लेखनी सब वनराय
सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुण लिखा न जाय।

हमारे यहाँ गुरु-शिष्य की बड़ी आदर्श व समृद्धिशाली परंपरा रही है। प्राचीन काल में शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर ही ज्ञानार्जन करते थे। गुरु संदीपन के आश्रम में रहकर ही एक ग्वाला योगीराज श्रीकृष्ण बना। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में रहकर ही एक राज कुमार मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनता है। चंद्रगुप्त मौर्य को चंद्रगुप्त मौर्य बनाने में उसके गुरु चाणक्य की ही प्रमुख भूमिका थी। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के कारण ही विवेकानंद, विवेकानंद बन सके। एकलव्य का उदाहरण सबने पढ़ा है जिसने अपने मानस गुरु द्रोणाचार्य के कहने पर अपना अंगूठा गुरु दक्षिणा में दे दिया था। शिवाजी अपने गुरु रामदास के लिए शेरनी का दूध लाने में भी नहीं हिचकिचाए थे।

हमारा अतीत बड़ा गौरवशाली रहा है। हम विश्व गुरु, विश्व के सिरमौर देश रहे हैं। जब आॅक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज व कैलीफोर्निया जैसे विश्वविद्यालयों का कहीं दूर तक नामोनिशान तक नहीं था तब हमारे यहाँ नालंदा, तक्षशिला व विक्रमशिला जैसे विश्व प्रसिद्ध विद्यालय थे। तक्षशिला विश्वविद्यालय में लगभग 10,500 भारतीय और विदेशी छात्र अध्ययन करते थे जिन्हें करीब 2,000 विद्वान शिक्षकों द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती थी। पाणिनी, कौटिल्य (चाणक्य), चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित जैसे विद्वानों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी।

हम वो देश रहे हैं जिसने दुनिया को शून्य की अवधारणा दी। डाल्टन से पहले परमाणुवाद का सिद्धांत कणाद ऋषिने दिया था। नागार्जुन ने दुनिया को पारे से सोना बनाने की विधि बताई थी। पाइथागोरस से पहले बौधायन ने ज्यामिति के सिद्धांत व पाई की गणना करना सिखाया था। दुनिया को आयुर्वेद पद्धति के बारे में आचार्य चरक, धन्वंतरि और सुश्रुत ने दिया। जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह एक बहुत बड़े खगोलविद थे। गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट व भास्कराचार्य को कौन नहीं जानता।

शिक्षक दिवस जहाँ एक ओर समाज को गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर गुरु – शिष्य को आत्मचिंतन, आत्मावलोकन का अवसर देता है। आज समाज में जो अपसंस्कृति व संस्कारहीनता की स्थिति देखने को मिल रही है कहीं उसका कारण यह तो नहीं कि शिक्षक अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन हो गया है। आज भौतिकता के युग में शिक्षा का क्षेत्र भी अप्रभावित नहीं रहा है। आज शिष्य में गुरु के प्रति पहले जैसा श्रद्धा का भाव देखने को नहीं मिलता और गुरु में शिष्य के प्रति पहले जैसा स्नेह नहीं रहा। गिरावट दोनों स्तर पर है। ऐसे में बालकवि बैरागी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं:

आज मैंने सूर्य से बस जरा सा यह कहा
आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा
तमतमाकर वह दहाड़ा मैं अकेला क्या करूँ
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो
संग्राम ये घनघोर है कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।

शिक्षक एक ऐसी मोमबत्ती के समान है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाशित व प्रदीप्त करता है। गुरु एक ऐसा दीप है जो रातभर जलकर अज्ञान रूपी तिमिर से लड़ता है। गुरु सूर्य के समान है जिसके प्रकाश से चंद्रमा रूपी शिष्य प्रकाशित होता है। और अंत में यही :

अँधेरा आया था माँगने को रोशनी की भीख
हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते।

डाॅ अनिल उपाध्याय
टूण्डला (फिरोजाबाद) उ. प्र.
संपर्क : 9412815392

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