भारतीय संस्कृति के संवाहक,प्रख्यात शिक्षाविद:-भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन- राजेश शर्मा पुरोहित

*भारतीय संस्कृति के संवाहक,प्रख्यात शिक्षाविद:-भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन*

संदर्भ:- 5 सितम्बर ,जन्म दिवस

“केवल निर्मल मन वाला व्यक्ति ही जीवन के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकता है स्वयं के साथ ईमानदारी आध्यत्मिक अखंडता की अनिवार्यता है।” ये शब्द थे भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जिन्होंने अपने जीवन के चालीस वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक बन कर निकाले।
वे कहते थे “कला मानवीय आत्मा की गहरी परतों को उजागर करती है कला तभी सम्भव है जब स्वर्ग धरती को छुए।” हर शिक्षक एक कलाकार ही होता है। धर्म के सम्बंध में उनके विचार थे कि धर्म के बिना इंसान लगाम के बिना घोड़े की तरह है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन जरूर करना चाहिए। लोकतंत्र के विषय मे उन्होंने कहा लोकतंत्र केवल विशेष लोगो के नहीं बल्कि हर एक मनुष्य की आध्यत्मिक सम्भवनाओ में एक यकीन है।लोकतंत्र में सबको आस्था रखना चाहिए।
डॉ. राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत के पहले उप राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के तौर ओर भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे दर्शन शास्त्र के ज्ञाता थे राधाकृष्णन शिक्षक थे इसीलिए उनका जन्म दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। बीसवीं सदी के विद्वानों में राधाकृष्णन का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने हिन्दू धर्म को भारत और पश्चिम देशों में फैलाने का कार्य किया।
5 सितम्बर 1888 को तिरुमनी गांव मद्रास में इनका जन्म हुआ। इनके माता पिता सिताम्मा, सर्वपल्ली वीरास्वामी थे। इनका विवाह सिवाकमु के साथ 1904 में हुआ। इनके पांच बेटियाँ व एक बेटा था। इनके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। विद्वान ब्राह्मण के घर जन्में राधाकृष्णन को इसीलिते बचपन से ही ज्यादा सुख सुविधाएं नहीं मिली।इन्होंने सोलह वर्ष की उम्र में विवाह किया था। जिनकी मृत्यु 1956 में हुई थी।
इनकी प्रारम्भिक शिक्षा तिरुमनी गाँव मे हुई। आगे की शिक्षा क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल तिरुपति से की। जहाँ वे 1986 से 1900 तक पढ़े। वेल्लूर कॉलेज से पढ़ाई की 1906 में दर्शन शास्त्र से स्नातकोत्तर किया। उन्हें शिक्षा लेते समय स्कॉलरशिप मिलती रही। 1909 में मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में दर्शन शास्त्र के अधयापक बने। 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक बने।1918 में मैसूर यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बने।
वे इसके बाद इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय दर्शन शास्त्र के शिक्षक बन गए। शिक्षा को राधाकृष्णन पहला महत्व दिया करते थे। वे बहुत ज्ञानी थे ।शिक्षा के क्षेत्र में उनकी बहुत रुचि थी। वे इसीलिए प्रसिद्ध व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं।वे जिस कॉलेज से स्नातकोत्तर किये थे वहीं के एक वर्ष तक उपकुलपति रहे। बाद में बनारस विश्विद्यालय के उपकुलपति बन गए। इसी दौर में उन्होंने दर्शन शास्त्र पर कई पुस्तकें भी लिखी।
वीर सावरकर स्वामी विवेकानंद उनके आदर्श थे। उन्होंने अपने लेखों भाषणों के जरिये विश्व मे भरतीय दर्शन शास्त्र को पहुँचाया। वे देश की संस्कृति को प्यार करते थे।
भारत को जब आज़ादी मिली तब नेहरू जी से इनकी मुलाकात हुई इन्हें सोवियत संघ राजदूत बना दिया गया। 1947 से 1949 तक ये संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे। संसद में सभी इनके कार्य व व्यवहार की प्रशंसा करते थे। अपने सफल अकादमिक केरियर के राधाकृष्णन राजनीति में आये। 13 मई 1952 से 13 मई 1962 तक देश के उपराष्ट्रपति रहे। 13 मई 1962 को वे भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। भारत का युद्ध उस समय चीन व पाकिस्तान से हुआ। चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पड़ा था। बहुत चुनोतियाँ थी उस कार्यकाल में।
इन्हें 1954 में भारत रत्न देश का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया।
इनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस घोषित किया। 1962 में इन्हें ब्रिटिश एकेडमी का मेम्बर बनाया। पॉप जॉन पोल ने इन्हें गोल्डन स्पर से सम्मानित किया। इंग्लैंड में इन्हें आर्डर ऑफ मेरिट सम्मान से सम्मानित किया।
राधाकृष्णन ने गौतम बुद्ध जीवन दर्शन, धर्म और समाज, भारत और विश्व, आदि किताबें अंग्रेजी में लिखी।1967 में26 जनवरी को बतौर राष्ट्रपति उनका आखिरी भाषण था।
भारतीय संस्कृति के संवाहक राधाकृष्णन आज हमारे बीच नही है परंतु आज भी उनके विचार प्रासंगिक है। वे एक आस्थावान हिदू विचारक थे। वे भारतीय दर्शन शास्त्र परिषद के अध्यक्ष थे। उन्हें कोलंबो व लंदन विश्वविद्यालय ने मानद उपाधियों से नवाजा था। उन्होंने विद्यार्थियों व लोगों में राष्ट्रीय चेतना फैलाने का कार्य किया। राष्ट्र प्रेम के लिए वे प्रसिद्ध थे । अंग्रेजी सरकार ने उन्हें सर की उपाधि प्रदान कर सम्मान दिया। उनके भीतर छल कपट अहंकार बिल्कुल नहीं था। आज़ादी के बाद वे पेरिस में यूनेस्को संस्था की कार्यसमिति के अध्यक्ष रहे। 1949 से 1952 तक मास्को में भारत के राजदूत बन कर रहे।
ऐसे दार्शनिक शिक्षविद लेखक जीवनभर शिक्षक बन कर रहे। इसिलए आज शिक्षक दिवस पूरा देश उनके जन्मदिन को मना रहा है।

– राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित”
शिक्षक,कवि,साहित्यकार
98,पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी
भवानीमंडी जिला झालावाड राजस्थान

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