गया जी से अंनत धीश अमन की अभिव्यक्ति – मौन

मौन

मौन आंतरिक शक्ति की प्रकाष्ठा है भवसागर के मंथन में अमृत की घूँट है जिस तक पहुंचने के लिए कोलाहल का पान करना पड़ता है ।।

हम भवसागर का जितना मंथन करेंगे हमें कुछ न कुछ मिलेगा धन वैभव, वाद विवाद , आचार्य विचार, रस रास,
भाव अभाव, सुगंध दुर्गंध, व्यक्ति व्यक्तिव हलचल और मौन ।।
हलचल वह विष है जिसके पान बिना मौन ‘अमृत’ तक पहुंच नही सकते है ।। मौन के स्थान पर पहुँचने मात्र से मानसिक शारीरिक और आत्मीक आनंद की प्राप्ति होती है,
किंतु चुप को मौन मान लेने से हीं दर्शनशास्त्र नष्ट हो जाता है हमें अंतर समझना होगा चुप और मौन में जिससे दर्शनशास्त्र अनंत काल तक बना रहेगा ।।

चुप अज्ञान का परिचायक होता है,
और मौन ज्ञान का परिचायक होता है ।।
चुप स्थिति को दर्शाता है
मौन ध्यान को दर्शाता है
चुप रहने से एकाग्रता नही होती है
मौन धारन करने से एकाग्रता होती है
चुप रहने से सफल हो सकते है
मौन धारन करने से विफल ही नही सकते है
चुप से जग को पा सकते है
और मौन से स्वंय और जगत को पाते है ।।

मौन से आयु की वृद्धि होती है जिसका प्रमाण धर्म ग्रंथ और महान व्यक्तियों के इतिहास में मिलता है ।। सकल ब्रम्हांड की स्थिति मौन है तभी जीवन का उथल पुथल मिलता हैं समय भी मौन हैं जिस कारण से हर पल को अनुभव कर रहे हैं ।।

मौन होने का तात्पर्य किसी विषय वस्तु पर ध्यान लगाना होता हैं और हर विषय वस्तु में परमात्मा का निवास हैं जिस कारण से हमें परमात्मा से मिलना होता हैं और हर विषय वस्तु तथा कल और काल का ज्ञान होता हैं ।।

अनंत धीश अमन
गया जी बिहार

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