दतिया से जगदीश सुहाने का लेख – जब वेदान्त पराजित हो गया

🛑जब वेदान्त पराजित हो गया।🛑

वेदान्त दर्शन सभी दर्शनों में सिरमौर है।
सिद्धान्त-मीमांसा में तो यह अपराजेय है।
लेकिन एक जगह यह पराजित हो गया।वह भी किसी विद्वान् से नहीं, ब्रज की भोलीभाली गोपियों से।

हुआ यों कि भगवान् श्री कृष्ण ने गोपियों को सांत्वना देने के लिए अपने मित्र उद्धवजी को अपना संदेश देकर उनके पास भेजा।

भारत की तो हवा में ही दर्शन लहराता है।यहाँ का निपट गँवार भी दर्शन की गहरी बातें करने लगता है–“होइहि सोइ जो राम रचि राखा।”या “परमात्मा तो कण-कण में व्याप्त है।”आदि।
फिर उद्धवजी तो ब्रह्मज्ञानी थे।सो उन्होंने ब्रह्म और जीव के अभेद का निरूपण करके गोपियों को समझाने का प्रयास किया।

पंच तत्त्व मैं जो सच्चिदानन्द की सत्ता सो तौ,
हम तुम उनमैं समान ही समोई है ।

कहै रतनाकर विभूति पंच-भूत हूँ की,
एक ही सी सकल प्रभूतनि मैं पोई है ॥

माया के प्रंपच ही सौं भासत प्रभेद सबै,
काँच-फलकानि ज्यौं अनेक एक सोई है ।

देखौं भ्रम-पटल उघारि ज्ञान आँखिनि सौं,
कान्ह सब ही मैं कान्हा ही में सब कोई है ॥31॥

भाव यह कि इस देह में जो चित् तत्त्व है वह चेतना तो हममें, तुममें सभी में एक ही है।शरीर भी सबके उन्हीं पञ्चभूतों से बने हैं।इस प्रकार जड देह और चेतन आत्मा की दृष्टि से सर्वत्र एक ही तत्त्व है।सृष्टि में जो भेद दीखता है वह माया के कारण है।इस माया के भ्रम को हटाकर यदि ज्ञान नेत्रों से देखें तो कृष्ण सब में हैं और कृष्ण में सब हैं।
“यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति”
गीता६/२०।इसलिए कृष्ण के वियोग की कल्पना ही भ्रम है।

उद्धवजी के इस अद्वैत दर्शन का गोपियों ने बड़ा प्यारा उत्तर दिया।
उन्होंने कहा–आप सैद्धांतिक विवेचन कर रहे हैं, हम आपके वेदान्त ज्ञान की जमीनी हकीकत देखे लेते हैं।आपको कुछ करना भी नहीं है।केवल कृपा करके आप अभी यहां से बापस मथुरा न लौटें।
दीवाली आने ही वाली है।
हम फिर अपने प्यारे श्रीकृष्ण के कहे अनुसार गिरिराज की पूजा करेंगे।
इन्द्र नाराज होंगे।इस समय तब का बदला लेने के लिए उनके पास सुनहरा अवसर है क्योंकि अब श्रीकृष्ण यहाँ नहीं हैं।

इसलिए यदि उन्होंने प्रलयंकारी मेघ भेजकर वैसी ही वर्षा की।तो आपके अद्वैत सिद्धांत की परीक्षा हो जावेगी।
यदि आपने गोवर्द्धन धारण करके ब्रज की रक्षा कर दी, तब तो “कृष्ण आप में हैं और कृष्ण में आप हैं “यह ज्ञान सार्थक होगा।हम साक्षात् जान लेंगे कि सारे भेद प्रातीतिक हैं, माया के विभ्रम मात्र हैं।
अन्यथा हमारी विरह वेदना के साथ आपका ब्रह्म ज्ञान भी उसी पानी में बह जावेगा।

इस भाव को एक कवि ने(जिनका नाम मुझे विस्मृत हो गया है) अपने कवित्त में इस प्रकार कहा है।आइए, मूल कवित्त का आनन्द लें:-
विलग न होहु ऊधौ,आवत दिवारी अबै
वैसिऐ पुरन्दर कृपा जो लहि जाएगी।

होत नर ब्रह्म, ब्रह्म ज्ञान जो बतावत आप
कछु एहि रीति की प्रतीति गहि जाएगी।।

गिरिवर धारि जो उबार ब्रज लीन्हों बलि
तौ तौ काहू भाँति वह बात रहि जाएगी।

नातरु हमारी भारी विरह बलाय संग
सारी ब्रह्मज्ञानता तिहारी बहि जाएगी।।

कहते हैं उद्धव जी का वेदान्त गोपियों से पराजित हो गया और वेदान्ती उद्धव ब्रज से भक्त बनकर लौटे।

गोपियों के इस अव्यभिचारी प्रेम के प्रति साष्टांग प्रणति के साथ

*जय श्री कृष्ण*।

जगदीश सुहाने
दतिया(म०प्र०)

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