अपने समय से गुजरते हुए: स्वप्न सच, तप और विश्वास की कविताएं – सुरेश उपाध्याय

पाठकीय टिप्पणी
कविता संग्रह – अपने समय से गुजरते हुए
कवि – डा. दुर्गाप्रसाद झाला

स्वप्न सच, तप और विश्वास की कविताए

वरिष्ठ कवि, समालोचक व शिक्षाविद डा. दुर्गाप्रसाद झाला का 12वा कविता संग्रह “ अपने समय से गुजरते हुए “ उमा ग्राफिक्स, शाजापुर से हाल ही मे प्रकाशित हुआ है. अत्यंत विनम्र व मृदुभाषी 86वर्षीय डा. झाला अपने प्रतिबद्ध व निरंतर लेखन से नई पीढी के लिए प्रेरणा स्त्रोत की तरह है. इस संग्रह मे उनकी 80 कविताओ के साथ कुछ मुक्तक व क्षणिकाए भी प्रकाशित है.
डा. झाला की कविताए हमारे समय के अंधेरे को इंगित करती, उसके मूल कारणो से परिचित कराते हुए प्रकाश की खोज करती दिखाई देती है. कवि इन कविताओ मे समाज की विद्रुपताओ व विसंगतियो से मुठभेड करते हुए विचार, संवेदना व विवेक के पक्ष मे खडा दिखाई देता है तथा आश्वस्त है कि लडने वाली ताकते अभी मौजूद है. झूठ व नफरत के बवंडर मे झूठ से मुठभेड का आव्हान करता कवि प्रेम के महत्व व जरूरत को भी रेखांकित करता है. शब्द की शक्ति व मनुष्य की जिजीविषा पर कवि का अटूट भरोसा है. पसीने की गंध व श्रम के सौंदर्य से रची कविताए मनुष्य की जिजीविषा का प्रतिक है. नदी, पहाड, धरती, आसमान, समुंद्र, चिडिया, फूल, दीया आदि बिम्बो का बहुतायत से प्रयोग कवि के प्रकृति के प्रति प्रेम व लगाव का प्रतिक है. भाषा की सहजता व प्रकृत के बिम्ब कविताओ के सम्प्रेषण को प्रभावी बनाते है.
बदलते परिदृष्य पर ‘ नया जमाना ‘ कविता मे कवि कहता है – हवा मे फैल रही है / धुंध / निगल रही है / रोशनी को, / अंधियारा खुश हो रहा है ! ———- नया जमाना / अपने नयेपन पर / इतरा रहा है !
अपने समय की विद्रुपता को व्यंजित करते हुए कवि कहता है – बहुत दिनो के बाद / खबरे नही पढी / किसी से बाते नही की / पान खाने चौराहे तक नही गया / लगा आज / सब कुछ खैरियत से है (बहुत दिनो के बाद) और अब / सबसे बडा अपराध है / जुल्म को जुल्म कहना ( सबसे बडा अपराध).
भाषा को विकृत करते समय मे कवि की चिंता इन पंक्तियो मे स्पष्ट सामने आती है – यह भाषा की रात है / जन्हा शब्द अंधेरे मे / भटक रहे है / और अर्थ चमगादड की तरह / उल्टे लटके हुए है/ इस रात मे / घुग्घू बोल रहे है / और आदमी / अपने दु:स्वपनो मे / घिघिया रहे है ( भाषा की रात ).
बच्चे समाज का आने वाला कल है तो आज वे हमारे लिए ऊर्जा व विश्वास का प्रतिक है . ‘ जब मै जाता हू किसी मुस्कुराते हुए बच्चे के पास ‘ कविता मे कवि कहता है – जब मै जाता हू / किसी मुस्कुराते बच्चे के पास / लगता है / पहाड की ऊंचाई / कलकल करती नदी की / तरल सुकुमार भावना / ताजे खिले फूल की महक / सब – / उसके अरूणिम अधरो मे / अपना-अपना अर्थ पा रही है.
लडकियो / बच्चियो / महिलाओ के प्रति यौन हिंसा के लगातार प्रकरणो से आहत कवि कहता है – मै उस अंधेरे से / मुक्ति चाहता हू / जिसमे गायब हो जाती है / बेटिया / और बन जाती है / भूखे भेडियो का ग्रास / —— जलाओ वह दिया / जिसकी रोशनी मे दिखे / आदमी का वह चेहरा / जो अंधेरे के खिलाफ / आग सा तमतमा रहा हो (अंधेरे से मुक्ति).
रोबोट युग की पदचाप के बीच पसीने की गंध व श्रम को प्रतिष्ठित करने के प्रयास कवि अपनी कविताओ मे करता है. अपने सपनो के सच होने का कवि को विश्वास है लेकिन तप और संघर्ष से ही यह हासिल किया जा सकता है, ऐसी उसकी दृढ मान्यता है.

सुरेश उपाध्याय

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