दिल्ली से कीर्ति तोमर की ग़ज़ल – कब तक याद करोगे

ग़ज़ल

बिताए लम्हे कब तक याद करोगे
नही है वो अभी कब तक इंतज़ार करोगे,

माना, उसने ज़ख्म दिया है तुम्हे यादों का,
कैसे भुलाओगे तुम उसे,उसकी बातों से

मेरे, जैसा नही था वो, लेकिन फरियाद मुकम्मल हुई,
नचीज़ से जो रहमत हुआ, हां वो दुआ क़ुबूल हुई

मत कर तू ये बाते, जिससे तकलीफें हज़ारो हुई
मेरी तरह ना बन तू भी, पता नही कैसे ये चाहत मेरी मुकम्मल हुई

लेकर तो गए थे हम भी, उन यादों से भरी एक पुतली
पता नही , वो कैसे मेरी चाहत से यूँ बेसब्र हुई
कहती तो थी कि साथ हु तेरे, पर पता नही कैसे वो भी बह चली

वो खाली सा किनारा था उस पहर का,
छोटा सा दौर था वो मेरी यादों का

पता नही कैसे ,सिमटा वो कुछ इस तरह, की मानो,
वो साये से मेरे यूँ बहता चला गया

कीर्ति तोमर, दिल्ली

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