हिसार से ऋतु गुलाटी का संस्मरण – बारिश

संसमरण। (बारिश)

उस दिन सांयकालीन भ्रमण पर निकले आधा घंटा ही हुआ था कि अचानक बादलो की आंख मिचोली शुरु हो गयी।घूमने चले तो गये हम पति-पत्नी पर वापिस आने से पहले ही बरखा रानी ने अपने बारिश रूपी पंख फैला दिये,और हम उनमे बुरी तरह फंस गये।
पति देव से मैने कहा भी था कि मुझे बादल छाये लग रहे है,सावन मे कभी भी बरस सकते है,पर ये माने तब ना,हंसकर बोले-
पति-अरे बड़ा मजा आता है भीगने मे,
आज कुदरत हम पर मेहरबान है।
मै- आपको भीगने मे मजा आता है मुझे नही,
दोबारा जाकर नहाना पडे़गा!
चौमासे का मौसम है,कपडे़ सूखते नही,और आज फिर भीग गये तो कपडे़ कहां सुखायेगे?
जल्दी से वापिस चलो।
पति-मै तो जरूर भीगूगां,तुमसे एक बात बताऊ।

बचपन मे स्कूल से लौट कर जब मै बारिश मे आता था तो सब दोस्त कहते थे हम तो बारिश रूकने के बाद घर जायेगे,मै अकेला ही था जो कहता था,ठीक है तुम मेरा बस्ता बाद मे मेरे घर पहुंचा देना,मै तो भीग कर ही घर जाऊगाँ।इधर बारिश शुरू हो ही गयी,
और देखते ही देखते खूब जोर से बारिश होन लगी।
मै भी मजबूर थी,क्या बोलू?
अब हम भीगते हुए वापिस आने लगे,एकाएक बारिश तेज हो गयी,तभी मैने सामने खड़ी एक जलेबी वाली रेहड़ी की ओट मे चलने को कहा,उस बेचारे ने अपने चोमासे से बचने के लिये प्लास्टिक की शीट लगायी हुई थी।ग्राहको के लिये इंतजाम किया था।हम वही बैंच पर बैठकर बारिश का मजा लेने लगे।
‌छम छम करके बरसती बारिश मे बैठी मै कुछ सोचने लगी।और कितने साल पहले बीती बारिश मे हुई वो दुखदायी घटना ने मुझे अतीत मे जा पटका।
मेरा दामपत्य जीवन अपना समय काट रहा था और मै कठपुतली की तरह दिनभर घर के खर्चों को सुचारु रूप से कैसे चलाऊ ?इसी पर मन ही मन घुटती रहती।पतिदेव एक चीनी मिल मे कार्यरत थे।थोडे से वेतन से घर की जरूरते मुशकिल से पूरी होती।बच्चो का भविष्य कैसे उज्ज्वल होगा?कैरियर बनाना है बच्चो का और ससुराल से कोई उम्मीद भी नजर ना आ रही थी।सोचते सोचते एक विचार आया,क्यो ना मै अपने पति की चीनी मिल मे ही कोई काम देख लू?
क्योकि मिल गांव मे थी और हमे रहने को आवास कालोनी मे दो कमरो का मकान इस लिये दिया गया था ताकि मिल मे कोई खराबी आ जाये तो मेरा पति दौड़कर वो अटैन्ड करे।
फिर सोचा अगर मै क्लर्क की नौकरी कंरू तो मुझे तो टाइप वगैरा कुछ आता ही नही?
अब टाइप भी कैसे सीखू?वो तो आठ किलोमीटर दूर है टाइपिंग सैन्टर।पतिदेव ने कभी नौकरी करने हुए हेतु विवश नही किया।वो खुद ही ओवरटाइम लगाते अकसर।
बहुत सोच विचार करने के बाद मैने ही फैसला लिया कि मै टाइपिंग सीखने सैंटर पर जाऊगी। सुबह बेटा बेटी को मै स्कूल भेजकर पतिदेव के ड्यूटी पर जाने के बाद पतिदेव का लंच बनाकर मै टाइपिंग सीखने जाने लगी।बहुत भरी हुई बस मे लटक पटक कर जाना होता। गांव मे चलने वाली बसे भी पूरी भरकर चलती।पैर रखने की भी जगह ना होती,ऐसे मे उस पर चढ़ना किसी महाभारत से कम ना था।
ऐसा ही एक बारिश का दिन आया मै साड़ी पहन व नयी चप्पल पहन कर गयी मगर वापिस टाइपिंग सीख कर लौटते समय बहुत तेज बारिश मे बस मे चढी,ज्योहि मिल बस स्टाप पर बस रूकी मैने देखा उसने मुझे आवास कालोनी पर ना उतार कर उससे पहले ही मिल गेट पर उतार दिया!मिल गेट से कालोनी गेट मे कम से कम दो किलो मीटर का फासला था।चारो ओर पानी ही पानी,लगता नदी सी बन गयी हो सड़क पर,इतनी तेज बारिश,उस पर पैदल चलना आसान ना था!मुझे सबसे ज्यादा दुख मेरी नयी चप्पल के गलकर टूटने का था जो बारिश मे खराब होने वाली थी मेरे आंसू आ गये मैने रोते रोते अपनी नयी चप्पलो को अपने हैड बैग मे डाल लिया,ताकि वो खराब होने से बच सके।और उस संघर्ष भरी बरसात मे मै जैसे तैसे घर पहुंची और मन भर कर रोयी!पतिदेव से क्या कहती वो फैसला तो मेरा था।।शाम को इनके आने से पहले मैने खुद को सामान्य कर लिया। भले ही मैने बाद मे नौकरी भी पा ली थी पर आज की बारिश ने मुझे उस दिन की बारिश को याद करा दिया।चलो चले,अब तो बारिश कुछ कम हो गयी है पतिदेव की इस आवाज से मै चौक गयी और अतीत से बाहर आ गयी।। जीवन मे कुछ घटनाएं चाहकर भी भुलाये नही भूलती और एक संस्मरण के रूप मन मे गहनता से घर कर जाती है।

स्वरचित व मोलिक
ऋतु गुलाटी, हिसार

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