इंदौर से रशीद अहमद शेख के आजादी पर मुक्तक

मुक्तक

युगों-युगों तक ज़ुल्म किया बर्बादी ने।
सहा बहुत कुछ भारत की आबादी ने।
आ पंहुचा पन्द्रह अगस्त सन् सैंतालीस,
तब अपना आशीष दिया आज़ादी ने।

ये ज़मीं आज़ाद है अब ये गगन आज़ाद है।
हम सभी आज़ाद हैं, अपना चमन आज़ाद है।
गुल भी अब आज़ाद है, बुलबुल भी अब आज़ाद है,
बाग़बां आज़ाद है, अपना चमन आज़ाद है।

धरा अधिक स्वतंत्र अब, गगन अधिक स्वतंत्र है।
स्वतंत्र पथ हुए सभी, पथिक-पथिक स्वतंत्र है।
स्वतंत्र हैं रहन-सहन, कथन,चलन, निजीकरण,
स्वतंत्र राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक स्वतंत्र है।

रशीद अहमद शेख ‘रशीद’

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