कुरबाई, विदिशा से प्रेमप्रकाश चौबे की बुंदेली ग़ज़ल

बुंदेली ग़ज़ल

हाड़ टोर रये, पसी बहा रए ।
शैर भेज कें, तुमे पढा रए ।

झूठी-सांची कसमें खा रए,
खूब चूतिया हमें बना रए ।

दारू पी रये, मुर्गा खा रये,
सोने जैसौ, समओ गमा रये ।

हम सोचत्ते, पढ़-लिख जै हौ,
तुम पैसा में आग लगा रए ।

कौन बनक की है, जा पीढ़ी ?
छोड़े आम, धतूरो खा रए ।

-प्रेमप्रकाश चौबे “प्रेम” कुरवाई

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