हजारीबाग से शशि बाला की रचना – तुम्हारी यादों की थाप

तुम्हारी यादों की थाप

मेरे हृदय पर तुम्हारी यादों की थाप
हल्की सी
और धक्क् से हो जाता है दिल
झक्क् से फैला हो उजाला जैसे
पलकें खुल जाती हैं
अधजागी सी थी
पूरी तरह जाग जाती हूँ
यहां से वहां तक
पाँव के नीचे की धरती से लेकर
दूर आकाश तक तन जाता है
झिलमिली उजालों का इन्द्रधनुष
सात रंगों के अलावा और भी
कितने कितने रंग घुल जाते हैं़
फिजाओं में
पलकें झपकाती हूँ तो
झनझनाहट सी गूंजती है
कहीं कोई सितार जैसी ध्वनि
मद्धिम मधुर मधुर
महसूस होता है ढेर से घुंघरुओं वाली पायल
पाँव में बाँध कर चल पड़ी हूँ
कहीं भी किधर भी
छम छम छम
बेवजह छमछमाकर चलती हूँ पायल
भागते हुए तितलियों के पीछे

महसूस होता है
समुंदर के किनारे खड़ी हूँ
लहरें आती हैं तो दौड़ कर
और आगे चली जाती हूँ
पानी के भीतर
और रुनझुन के स्वर
लहरों पर बिखर बिखर जाते हैं
दूर तक देर तक
ओह
तुम ऐसे घुले हो भीतर भीतर
तुम्हारी यादें ऐसे करती हैं शरारत
तार तार झनकार भर जाती हैं
चाँद तारे जुगनू पंछी या फिर
पुरवाई ही क्यों न हो
सब पूछते हैं हाल
और मैं ऐसे शर्मा जाती हूँ
जैसे नया नया है इश्क हमारा…

शशि बाला,हजारीबाग

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