फरीदाबाद से अंजना झा की लघुकथा – अपना घर

अपना घर

आज पडो़स से पहली बार रीना के चिल्लाने की आवाज आई __ जिसे रहना है इस घर में वो मर्यादित होकर रहें नहीं तो बाहर जाने के लिए दरवाजा खुला है।
मैं स्तब्ध होकर सोफे पर बैठ गयी। और मेरा मन सात साल पीछे चला गया। जब रीना और रमेश पडो़स में रहने आये थे।
बहुत ही सभ्रांत परिवार लगा था। मिलने गए थे हम और बहुत ही आदर भाव से स्वागत हुआ था हमारा। बातचीत से पता चला रमेश सरकारी नौकरी में उच्च पद पर हैं और रीना भी उच्च शिक्षा प्राप्त कुशल गृहणी है। उनके रहन सहन और बातचीत के तरीके से मैं बहुत प्रभावित थी।
कुछ दिनों बाद अचानक रमेश के तेज चिल्लाने की आवाज से मेरी नींद खुली घड़ी देखा तो रात के 12बज रहे थे कुछ देर तक चीजों के उठापटक के बाद शांति हो गयी। मैं हतप्रभ थी और सुबह रीना से मिलने का सोच कर सो गयी। पर अगले कुछ दिनों तक सिर्फ रमेश के कार्यालय आने जाने के क्रम में ही उनका दरवाजा खुला। अब हर दस दिन पर रमेश के चिल्लाने और चीजों के तोड़ फोड़ की आवाज आनी मेरे लिए सामान्य बात हो गई थी।
एक दिन समय पाकर रीना को कुरेदा तो फफक कर रो पडी़।
रमेश को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं है और उनको अपने माता पिता से बहुत लगाव है। और इसी का फायदा उठाकर वो लोग मेरी छोटी सी गलती बढा चढ़ा कर बोलते हैं और फिर मुझे अपने मायके जाने को कहा जाता है। पहले भी सास ने अपने घर से यही कहकर निकाला था कि यह तेरा घर नहीं है।
मैं माँ के पास रहने गयी पर उन्होंने भी यही कहा
शादी के बाद बेटी का ज्यादा दिन मायका में रहने पर लोग बातें बनाएंगे तू रमेश के पास चली जा अब वही तेरा घर है।
फिर मैं किराये के एक कमरे में रमेश के पास रहने आ गयी। रमेश दिल के अच्छे हैं पर शराब के नशे में कुछ भी कर गुजरते। बहुत मुश्किल से मैंने पायी- पायी जोड़ कर ये घर खरीदा । पर ससुर जी ने इस घर को रमेश के नाम ही करवाने का आदेश दिया। और अब जब भी रमेश को गुस्सा आता मुझे घर से निकालने की धमकी देते हैं। मैं समाज में बदनामी के डर से सब सह लेती हूँ। आखिर इन छोटे बच्चों को लेकर कहाँ जाउंगी।
फिर मैंने कहा – कौन सा समाज रीना जब तू दस दिनों तक घर से बाहर नहीं निकलती तब तो कोई नहीं पूछता कि तू भली चंगी है या नहीं। तेरे बीमार पड़ते ही सास ससुर दूसरे बेटा बहू के पास चल देते हैं। उच्च शिक्षित हो कर भी तूने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया रमेश के लिए। अपनी अधुरी इच्छा का तिनका तिनका जोड़ कर तूने ही तो ये घर खरीदा है। यह घर तेरे अरमानों के लहु से सिंचित है रीना। फिर तुम क्यों नहीं इस घर परअपनाअधिकार समझ रही। आज विवाह के 17 साल बाद भी अपने घर की तलाश में क्यों अपनी अंतरआत्मा को बेचैन की हुई हो। मेरे इतना समझाने के बाद अचानक ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। और बिना चाय पिये धन्यवाद दी कहकर वह चली गई।
और आज इतनी देर तक चीखने चिल्लाने के शोर के कुछ ही देर बाद बहुत ही सहज भाव से रीना को मैंने रिक्शा पर बैठकर जाते देखा बिना किसी ग्लानि के। आज पूर्ण स्वाभिमान और आत्मविश्वास के संग वह जा रही थी — “””अपने घर””” का राशन लेने। और मेरी निगाहें गली के मोड़ तक अपलक उसे निहारते हुए तृप्त हो रही थीं।
अंजना झा
फरीदाबाद हरियाणा
यह मेरी अप्रकाशित मौलिक रचना है।

Please follow and like us:
0

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*