दतिया से जगदीश सुहाने की अभिव्यक्ति – राजा एक/रानियाँ एक करोड़


🌹राजा एक/रानियाँ एक करोड़🌹

एक राजा की एक करोड़ रानियाँ!!!
लगता है गल्प नहीं महागल्प है।
अतिशयोक्ति नहीं अत्यन्तातिशयोक्ति है।

सौभरि ऋषि की साठ पत्नियां थीं, मान लिया।क्योंकि कथा है कि वे सिद्ध योगी थे।उन्होंने स्वयं को साठ रूपों में बना लिया और प्रत्येक पत्नी के साथ एक देह से रहते थे।

भगवान् कृष्ण के १६१०८ रानियाँ थीं।
मानना पड़ता है क्योंकि वे स्वयं भगवान् थे, योगेश्वर थे।इन्होंने भी अपने १६१०८ रूप बना लिए थे और एक-एक रूप से सभी रानियों के पास रहते थे।

पर श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध में कथा
आती है।कि एक राजा चित्रकेतु हुए, उनकी एक करोड़ रानियां थीं।
ये भगवान् श्रीकृष्ण से भी बहुत आगे निकल गए।
एक करोड़ रानियाँ !!!
ये योगी नहीं थे।इन्होंने स्वयं को एक करोड़ रूपों में विभक्त नहीं किया था।
इसलिए आश्चर्य होता है।
इसलिए यह कथा गल्प नहीं महागल्प लगती है।
अतिशयोक्ति नहीं अत्यन्तातिशयोक्ति प्रतीत होती है।
लेकिन यह सत्य है।अनुभूत सत्य।
पुराणों में सत्य को उद्घाटित करने के लिए जो लाक्षणिक शैली अपनायी गई है उसे न समझने के कारण हमें आश्चर्य होता है।
निरन्तर चित्र-विचित्र संकल्प-विकल्प करना ही जिसकी पहचान (केतु=ध्वजा)है ,उस मन का प्रतीक ही राजा चित्रकेतु है।
इसकी एक करोड़ (असंख्य)कामनाएं ही रानियाँ हैं।
लेकिन आश्चर्य!एक भी रानी को सन्तान नहीं है।
अर्थात् एक भी कामना फलवती नहीं हो रही है।
हमारी धारणा इसके विपरीत है।
हम मानते हैं कि असंख्य कामनाओं में कुछ सफल भी होती हैं।
लेकिन विवेकवान् ऋषियों का अनुभव है कि असंख्य कामनाओं में एक भी कामना स-फल नहीं होती।
इसीलिए भगवान् गीता में कहते हैं–“कामात् क्रोधो$भिजायते।”यदि सफल हो जावे तो क्रोध क्यों हो?
होता यह है कि जब तक एक कामना पूर्ण होने के समीप होती है तब तक बीसियों नई कामनाओं का उदय हो जाता है।और जिस आनन्द प्राप्ति के लिए हमने कामना की थी, (कामना तो साधन है, साध्य तो आनन्द प्राप्ति है।)जिसके लिए हमने हरसंभव प्रयत्न किये थे,वह आनन्द हमें मिल ही नहीं पाता।
कथा कहती है एक दिन चित्रकेतु नरेश के यहाँ अंगिरा ऋषि पधारे।राजा की असह्य वेदना से करुणार्द्र होकर उन्होंने बड़ी रानी को एक पुत्र होने का वर दिया।समय आने पर रानी से एक पुत्र का जन्म हुआ।
हमारी भी जब किसी कामना के लिए तीब्र छटपटाहट होती है तो कोई सहयोगी भी मिल जाता है और वह कामना पूर्ण भी हो जाती है।
लेकिन बड़ी रानी के सन्तान होने से राजा की अनुरक्ति बड़ी रानी के प्रति बढ़ गई।इससे जलकर अन्य रानियों ने योजना बना कर उस बालक को जहर दे दिया जिससे बालक मर गया।
हमारी सफलता से भी सबसे ज्यादा हमारे ही सम्बन्धी ईर्ष्या करते हैं और हमारी सफलता को निष्फल कर देते हैं।
इसलिए संसार के इस सत्य को हम हृदयंगम करें कि सांसारिक सुख के लिए की गयीं कामनाओं और प्रयत्नों का अन्त दु:ख में ही होता है।
कर्माण्यारभमाणानां दु:खहत्यै सुखाय च।
पश्येत् पाक-विपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्।।
भागवत११/३/१८
जीवन इन्हीं प्रयत्नों में गुजर जाता है कि दु:ख मिटें,सुख मिले।लेकिन हो उल्टा रहा है, दु:ख पीछा नहीं छोड़ते।स्थायी सुख मिलता नहीं।
इसलिए लोकव्यवहार के लिए हम कामनाएं भी करें, सफल होने के लिए भरसक प्रयत्न भी करें।लेकिन उनमें आसक्त न हों।यही उपदेश देकर अंगिरा ऋषि और देवर्षि नारद ने भागवत में राजा चित्रकेतु की आसक्ति मिटाई है।
हमारे शास्त्र लोक,लोकव्यवहार और भोतिक समृद्धि की उपेक्षा नहीं करते, लेकिन इनमें आसक्त होने से रोकते हैं। क्योंकि आसक्ति न केवल परमार्थ से वंचित कर देती है वरन् जीवन का संतुलन भी भंग कर देती है।

मेरी दृष्टि में कामनाओं के अनन्त विस्तार की प्रतीक हैं-एक करोड़ रानियाँ।यहाँ करोड़ शब्द सीमा-विशिष्ट संख्या का बोधक नहीं है,अनन्त का सूचक है।
चित्रकेतु मन का प्रतीक है जो अनन्त कामनाओं (रानियों)के साथ विलास में डूबा रहता है।
कामनाओं की अनन्तता अपनी जगह रहेगी, मन उनके साथ विलास में रस लेगा।इनके बीच में रहते हुए हम अपना साक्षी भाव जागृत रख सकें-यही जीवन की सफलता है, यही पुराण का संदेश है।
जगदीश सुहाने, दतिया

Please follow and like us:
0

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*