उज्जैन से संदीप सृजन का व्यंग्यआलेख – आप “ई” नहीं है तो कुछ भी नहीं है

व्यंग्य

आप “ई” नहीं है तो कुछ भी नहीं है

आप वर्तमान दुनिया में “ही”(HE) है या “शी”(SHE) है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यदी आप “ई” नहीं है तो कुछ भी नहीं है । चौंकिए मत, “ई” वह है जो स्त्री को स्त्री और पुरुष को पुरुष होने का आभास कराता है। आने वाले समय में अपने आप को “ही” या “शी” के रूप में प्रस्तुत करने का कोई प्लेटफार्म होगा तो वो होगा केवल “ई” प्लेटफार्म वरना आप “इट”(IT) हो जाएंगे। “ई” होना ही आपका धरती पर होने का प्रुफ होगा । हमारी सरकार भी आपको हर तरह से “ई” बनाने में लगी है। रुपया-पैसा, प्यार-मुहब्बत, चिट्ठी-पत्री, बधाई-शुभकामनाएं, मिठाई सब कुछ “ई” हो रहा है। सच बात यह है कि आप वर्तमान में “ई” युग याने डिजिटल युग है और आप डिजिटल सोशल साईड याने फेसबुक , व्हाटसएप, इंस्टाग्राम पर अपना दखल नहीं रखते तो आप समझ लिजिए आप वर्तमान से सदियों पिछड़े है ।

वर्तमान में “ई” प्लेटफार्म की खासियत है आप “ही” है तो ठीक-ठीक है और यदी आप “शी” है तो आप विशेष है। याने आप “शी” है और “छींक आई” ये भी फेसबुक नामक “ई” प्लेटफार्म पर लिख दे तो दो हजार से ज्यादा लोग जो कि घर के लोगों से भी ज्यादा प्यार दर्शाते हुए लिखेंगे “टेक केयर”, “अपना ध्यान रखो”,”जल्दी स्वस्थ हो जाएगे” लिख कर आपका मनोबल बढ़ाएंगे। पर आप “ही” है तो इन्हीं दो शब्दों पर सौ-दो सौ लोग जो कि जान पहचान वाले होंगे “ई” प्लेटफार्म पर मसखरी करते हुए लिखेंगे “रात को काली मिर्ची की चाय पी लेना”, तो कोई लिखेगा “तुलसी अदरख और गिलोई का काड़ा पी लो जल्दी अच्छे हो जाओगे”, तो कई लिखेगा “सर्दी की है एक दो दिन में सर्दी चली जाएगी चिंता मत करो” आप “ही” है तो “ई” प्लेटफार्म पर थोड़ी हमदर्दी और आप “शी” है तो जैसे सारी दुनिया को छीक से बैचेनी हो रही है लेकिन आप “ई” मंच पर नहीं है तो घर के दो लोगों को भी आपकी छींक सुनाई नहीं देगी यह पक्का है।और पड़ोसी और रिश्तेदार को तो सालों तक पता नहीं चलेंगा कि आपको छींक आई थी।

चिट्ठी-पत्री, तार, टेलिफोन और कीपैड वाला मोबाइल ये सब गुजरे जमाने की चीजें होती जा रही है। जिन्हें भविष्य में किसी म्युजियम की शोभा बढ़ाने या घर को म्युजियम बनाने के लिए कुछ लोगों ने सहेज कर रखा हैं। पर ये सब स्मृति शेष हो गये हैं। कुछ सालों बाद ये चीजें होती थी या इनका जमाना था यह बात आने वाली पीढ़ी के सामने रखने के लिए भी आपको “ई” होना पड़ेगा। याने आप फेसबुक या इंस्टाग्राम पर उनका फोटो डालेंगे और साथ में कैप्शन लिखेंगे “हम उस युग में पैदा हुए थे, तब टेलिफोन नामक यह यंत्र होते थे” या कोई पुरानी चिट्ठी जो किसी किताब में पड़े पड़े ही तार-तार होने को आ गई है उसका फोटो डालकर कैप्शन देंगे “खतों से गुलाब की महक आती है” जबकि खत का कागज सड़ गया होगा और बदबूदार हो गया होगा ।

आप कवि या कवयित्री है तो आपका “ई” होना बहुत जरुरी है वरना आप न “ही” रहेंगे और न “शी” । आपने अपना खून पसीना एक करके कुछ लिखा और कोई वाह-वाह न करे तो वह लिखना बेकार है, आपके घर वाले तो आपके लेखन से सौतन वाला रिश्ता निभाते और यार दोस्तों चाय चटकारे से जाम तक का लेकिन बिना स्वार्थ के वाह वाही करने वाले केवल और केवल “ई” प्लेटफार्म पर ही मिलते है।

सच है इस दुनिया से आगे भी दुनिया है जिसे “ई” दुनिया कहते है इसके कई घाट है और कई बांट और जो इस पर छा गया उसके बड़े ठाठ है।

संदीप सृजन
संपादक-शाश्वत सृजन
ए-99 वी.डी. मार्केट, उज्जैन 456006
मो. 9406649733
मेल- shashwatsrijan111@gmail.com

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