इंदौर से रशीद अहमद शेख के वर्षा पर मुक्तक

🌧🌧🌧🌧वर्षा पर मुक्तक 🌧🌧🌧🌧

सूर्य अचानक लुप्त हो गया रात हुई!
सर्द हवाओं से गर्मी की मात हुई!
अमृत की बूँदें जड़-चेतन पर बरसीं,
भरी दोपहर में जमकर बरसात हुई!

भीगे सभी सुमन हैं, भीगीं हैं सभी कलियाँ!
बूँदों के साथ नाचे शाखाओं के फल-फलियाँ!
कानन हो या उपवन हो वर्षा में नहाए हैं,
पुलकित हुई हैं सड़कें, हर्षित हुई हैं गलियाँ!

श्वेत,श्याम,सुरमई,रजत,स्वर्णिम,लोहित नभ।
इन्द्रधनुष द्वारा सरगम करता अंकित नभ।
‘नीलगगन’ घोषित करता है एक रंग ही,
पर अनेक रंगों को करता है पोषित नभ।

ताल-तलैया, नाले, निर्झर।
सरिता के संग हुए अग्रसर।
भेद भंग हो गए अंतत:,
कहलाए सब मिलकर सागर।

-रशीद अहमद शेख ‘रशीद’
इंदौर

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