अम्बिकापुर से आचार्य दिग्विजयसिंह तोमर की रचना – नटी नारी

*नटी नारी*

चिर -नवीन नटी-नारी
नृत्य-कृत्य से थी लुभा रही।
वर्ण-सुवर्ण सुमनी सुंदरी
सुमनों को थी खिला रही।।

उतान1-उरोज सदृश्य सरोज
थी लचक लिए लहरा रही ।
रमण्या2 की भाव-भंगिमा
मधुनिशा3 सी थी भा रही ।।

उत्कंठ उत्कंठा लिए उत्कंठिता4
अधरों को थी दबा रही ।
पिपासित कंचनी की अग्नि
हृदय को थी हर्षा रही ।।

आभार प्रगट करत अति
आरती थी उतार रही ।
जन्म-जीविका मात्र मही
परम् प्रसाद थी पा रही ।।

1-जो छाती ताने हुए हो। 2-रमण करने वाली।
3-सुहाग रात। 4-प्रिये मिलन के लिए वेचैन नायिका।

आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर

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