नई दिल्ली से कमल गर्ग की कविता – सूनी गली

सूनी गली
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मंडी मे फूलो की चढ़ने लगी है बोली ,
आज फिर हसरते चढ़ने लगी है डोली ,
बदन मे उन्माद की बढ़ने लगी गोली ,
अंग -अंग पे मेरे निखार आने लगा यूॅ ,
जैसे उबटन मले दुल्हन नई नवेली ,
सुहाग की सेज से झरने लगे फुल यूॅ ,
बसंत ऋतु फूलों से भर जाए जैसे झोली ,
मुस्कुरा कर बोले आज सालो बाद वो ,
आ करीब इतने एक हो जाऐ हम जोली ,
मकरंद महका शर्माने लगी चांदनी भोली,
रात यह मधुमास की घूंघट में शर्माने लगी,
वक्त की चक्की में पिस गई थी चंचल कली,
सोलह कि यौवना सी अंगड़ाई लेने लगी ,
काम के तीर तरकश से पिय ने ऐसै भरे ,
विस्तार के प्रबंध में दो सहचरी हो बढ़ चली ,
तप के प्रारंभ में हल्द-लेप से देह हो मली ,
आज हृदयतल से पीय यू तन से मिले ,
सूरज मिलने धरती से उतरा हो सूनी गली ।।

(चंद साॅसे )
स्वरचित् ✍🏻कमल गर्ग, दिल्ली

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