108 मनके: कविता संग्रह की हरेक रचना में छुपा हुआ है एक कथ्य – समीक्षा,भावना भट्ट

समीक्षा

कविता संग्रह : 108 मनके
कवियित्री: कुन्ना चौधरी
प्रकाशन : बोधि प्रकाशन
पृष्ठसंख्या: 148
मूल्य: रु.150

कुन्ना चौधरी के भावों के बहुमूल्य मोती से पिरोई गयी ये माला वाकई सुंदर लगी। समय, कुदरत,जीवन, रिश्ते,जैसे विभिन्न पहलुओं पर सृजित हुई उनकी रचनाएँ, जीवन के विविध आयामों से रूबरू करवाती जैसे सरिता बन पड़ी है।
वो अगर मौसम की बात हो ..! या मिट्टी की, भिन्नता में भी एक सकारात्मक संदेश देती हुई उनकी रचनाएँ, पाठकों को एक नया दृष्टिकोण देती है। आधुनिकीकरण के चलते धरती माँ की वेदना हों..! या औद्योगिकीकरण के चलते प्रदूषित हवा और प्रदूषित जमीन का दर्द हों..! वही दर्द पढ़ते समय पाठकों को आत्मसात होता है।

‘मैं का से कहुँ’ नामक रचना की अनमोल पंक्तियां

माना सब जीवों में मानव तू है श्रेष्ठ
पर तेरा विकास ही बन गया कमजोरी..

‘ जीवन जैसे बहती सरिता ‘ जीवन की घटनाओं को सरिता के जरिये बहुत खूबी से दर्शाती पंक्तियां

नये मोड़ पर होता दूसरी धारा से संगम,
रचते मनोरम प्रयाग..

तो कभी जीवन के रंग बदलने की बात लेकर आयी रचना ‘कुछ ऐसा हो’ बहुत ही सुंदर रचना बन पड़ी है। जिंदगी की कश्मकश के रहते हुए भी जिंदगी का स्वीकार कराती रचना ‘उन्मुक्त’ भी अच्छी लगी। रचना ‘दूरियां ‘ रिश्तों के खोखलेपन से मुलाकात करवा गई

आज की दिशाविहीन युवा पीढ़ी की चिंता कवियित्री को है। वो अपनी रचना ‘बहके क़दम’ में इसे ऐसे पिरोती है..

न मन की आँखों से देखते हैं,
न आत्मा की आवाजें सुनते हैं
ये तो मनमौजी आवारा परिन्दें हैं
जो विपरीत दिशा में परवाज़ भरते है…

आधुनिकता की दौड़ में अपनी ममता को खो चुकी मम्मी का बहुत ही सटीक विवरण ‘मतलबी मम्मी’ की कुछ पंक्तियाँ

समय के साथ घरेलू माँ, हो गई कामकाजी मम्मी,
उनकी छवि त्यागमूर्ति माँ से हो गई मतलबी मम्मी

कविता संग्रह की हरेक रचना में एक कथ्य छुपा हुआ है। जहाँ तक ले जाने में रचनाकारां सफ़ल हुई है।
समय के साथ उनकी रचनाओं में और भी पारदर्शिता आएं, उनकी कलम और ज्यादा ताक़तवर बनें ऐसी शुभकामनाएं

भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात

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