नागपुर से गायत्री शर्मा चेतना की कविता – हौसला

* हौसला*                               

 गरीबी! क्या तू मेरा               
 पीछा नहीं छोड़ेगी ?                                                         
 बचपन में थी तू मेरे संग
 तो बदल दी मैंने शिक्षा की राह।
 जवानी में भी थी तुझे
 मेरा साथ निभाने की चाह।। 

बेबसी! तूने भी सोचा
बहती गंगा में हाथ धो लू।
 गरीबी के साथ मैं भी 
ठिठोली के बीज बो लू।।

 कमजोरी तुझे तो जीवन में 
कभी नहीं अपनाना है। 
राह पर डटे रह कर 
आगे बढ़ते ही जाना है।।

नाकामयाबी बस एक 
तेरी ही कमी थी। 
अभावों के कारण तरक्की
रास्ते में कही थमी थी।।

 गरीबी! क्या तू मेरा
 पीछा नहीं छोड़ेगी? 
मत दे मेरा इतना साथ 
कि अमीरी भी मुझसे मुंह मोडे़गी।।

 इन चारों को इस प्रकार कड़ा
 जवाब दिया,
 हौसले ने मेरे सब का
 होश उड़ा दिया ——-

मुझमें मेरा हौसला मैंने 
अभी तक रखा है जिंदा।
 हौसले से ही तो मेरे
 तुम सब हो शर्मिंदा।। 

एक दिन ऐसा आएगा
 योग्यता, मजबूती, सामर्थ्य, शक्ति
सक्षम, प्रतिभावान मुझे बनाएगी 
उज्जवल भविष्य से कामयाबी
 कदम मेरे हमेशा चुमते ही जाएगी।।

 – गायत्री शर्मा “चेतना”
  दत्ता वाडी, नागपुर

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