डेराबस्सी मोहाली, पंजाब से शशिकांत श्रीवास्तव की रचना – फसल

मेरी कलम से …..

*फसल *
दूर तलक ,
लहलहाती हुई फसलों को
देखकर — भूमि पुत्रों का
मन –हर्षित हो उठा
ऐसा लग रहा था
मानो –धरा ढ़की हो
एक सुनहरी चादर से |
आया समयफसल कटने का
उत्सव सा –माहौल बना था
खेतों और खलिहानों में ,
क्या बच्चे –क्या बूढ़े
सभी मगन थे खेतों में |
कुछ कटकर –रख्खे थे
खलिहानों में –कुछ
बाकी ,थे कटने को –खेतों में
कुछ के दाने –निकल गये थे
कुछ बाकी थे –खलिहानों में |
परन्तु , यह क्या …..?
रात अचानक —बिजली कौंधी
और — गरजे बादल
साथ में लाया , ओला —पानी
बिन मौसम बरसात हुई |
हुआ सवेरा …….,
सारी फसलें गिरी पड़ी थी
और बिखरे थे , दाने
खलिहानों की सारी फसलें
डूब गई थी पानी में |
कोलाहल सा मचा हुआ था
सारी फसलें नष्ट हो गई
सारी मेहनत जाया हुई |

– शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब

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