Devendra Soni April 17, 2019

लघुकथाः
बडा होने दे मुझे

जब वह गोद मे था,तभी पिता का साया सिर से उठ गया था।मां ने ही उसे पाल पोष कर बडा किया।
पढने मे वह तेज था।साथ ही महत्वाकांक्षी भी।अक्सर मां से कहता-“बडा हो जाने दे मुझे,तुझे इतना सुख दूंगा जो आज तक किसी को न मिला होगा।
तब मां बेटे को अंक मे भर लेती।
पहले स्कूल फिर कालेज की पढाई समाप्त कर उसने.बैंक की प्रतियोगिता पास की।मां की आशा फलीभूत हुई।उसने पूरे मुहल्ले को मिठाई बांटी।अच्छा घर देख कर सुंदर कन्या से उसका विवाह भी कर दिया।
आर्थिक स्थिति बदली तो बेटे का मन भी बदल गया।अब उसे मां की उतनी परवाह न थी।पहले तो सुबह शाम वह मां के पास बैठ कर सुख दुःख की बाते करता, अब दिन भर बैडरूम मे रहता।समय पर आफिस जाता।शाम को चाय के बाद बेटा बहू सैर सपाटे या पिक्चर देखने निकल जाते।मां अकेली ही घर पर रहती।
एक दिन किसी काम से रसोई जा रही थी,रास्ते मे बेटे का रूम था।वहां से गुजरते हुए उसे बेटे की आवाज सुनायी दी,”वह बहू से कह रहा था,मै तुम्हे इतना सुख दूंगा,जितना आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया होगा।
मां को पंदरह वर्ष पूर्व बेटे की कही बात याद आ गयी।आंखों से आंसू निकल पडे।लंबी सांस लेकर पूजा घर मे चली गयी।
– महेशराजा
वसंत 51,कालेज रोड।
महासमुंद।छत्तीसगढ़

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