हजारीबाग से शशि बाला की कविता – कायनात एक सा बाँटती है

कायनात एक सा बाँटती है

कायनात एक सा बाँटती है
धूप हवा छाँव सुरमई
नहीं करती कोई भेद भाव कभी
चाहे नन्हीं बूँदें हों या झम झम पानी
लहरें हो हहराती हुई या
झरनों की रवानी
अवनि अंबर क्षितिज सब पर
सबका समान अधिकार
दूब पर मोती बन कर चमकती हुई
सात रंग में टूटी हुई किरणें हों या
नाजुक पत्तों पर सरगम सी बजती
कोमल कलियों और वल्लरियों पर
ता थैया नाचती हुई हवा हो

घनघोर वनप्रदेश में सनसनाहट बन गूँजती
ब्रह्मांड की ध्वनि हो
या धरती पर कतरे कतरे बरसती
चाँदनी हो
कायनात सब को एक सा बाँटती है
माँ की तरह
जिसके नयनों में सब संतानों के लिए
एक सा प्रेम एक सा उजाला होता है।

– शशिबाला , हजारीबाग

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