Devendra Soni April 15, 2019

सुर्ख़ पड़ी बगियाँ हैं,
जीवन देखों सखियाँ हैं,

नज़्म की रंगरलिया हैं,
अज़्म की गुस्ताखियाँ हैं,

तर्ज़ नहीं अर्ज़ हैं,
ये जीवन की गाथा हैं,

हुई जो गलियारों में हैं,
सुखी पड़ी गलियों में हैं,

दामन के नाम हैं,
देखों सब ज़हनसीब हैं,

अधरों पर बैठी हैं,
जो वो कोमल उसकी बोली हैं,

मधुर स्वर गीत सुनाती हैं,
ये उसकी मीठी मधुशाला हैं।।

हार्दिक महाजन,खरगोन

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