अम्बिकापुर से आचार्य दिग्विजयसिंह तोमर की रचना – पथिक

*पथिक*

संग-सहेली सोन चिरइया
चेतन पर थी मंडरा रही ।
चैत-नवमी की दोपहरिया
चिता जैसी थी जला रही।।

कहीं मिल जाय छांव तनिक
तप्त-तपिश को सह लूं री ।
दूर था अब भी गंतब्य-गतिक1
गरम-गंगोटी2 से बच लूं री ।।

बड़ पीपर पाकड़ पोखर
और अमलतास आदि रुख ।
झाड़-झाड़ी झेल-झुलसन
पितरों जैसे देते थे सुख ।।

बैठ एकांत स्वर्ण-रेखा तट
तटक3 निहारत निसदिन दीन ।
पापियों के पाप ढोते
सरित होती रही श्रीहीन ।।

था काटों को काटना
क्यूँ पुष्प!पेड़ पशु पक्षी मही ।
मरत मीन मलदूषन4 से
स्वच्छ सरोवर नीर नही ।।

गंतब्य-लक्ष्य।। गंगोटी-नदी की बालूई भूमि ।।गतिक-आश्रय।।
तटक-नदी।। मलदूषन-दूषित गंदगी।

– आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर।

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