हाथरस से झलक अग्रवाल की रूमानी कविता

रूमानी कविता

कविता,,,,,
कविता बस यूहीं नहीं बन जाती,,
थोड़ा लड़ना पड़ता है
थोड़ा झगड़ना पड़ता है ,,
थोड़ा मनाना पड़ता है
थोड़ा समझाना पड़ता है
खुद से इश्क़ करके
खुद में ही डूब जाना पड़ता है,,
बिखरे एहसासों को सुलझाके
उनको शब्दों की सिलाई से
एक एक फंदा गिनके
बुनना पड़ता है,,
और उसमे अपनी कल्पना से
प्रकृति के भिन्न भिन्न रंगों की
आकृति डालकर,,
उसको एक सुंदर सा,,सलोना सा
रूप देना पड़ता है,,,,
ताकि वो पहनने वाले की
आँखों से उतरकर
पहले उसके दिल
फ़िर जहन और फिर
उसके रोम् रोम को बींदता
हुआ उसके भीतर दबे हुए
जज़्बातों में जा मिले,,,
और उसके अंदर से ये आवाज आये
कि शायद कवि ने
मेरी ही स्याही को अपनी
कलम् में डालकर उसको
बड़ी ही खूबसूरती से
इस पन्ने पर उतारा है,,
या फिर शायद कवि के
एहसास मेरे एहसासों से
जा मिले हैं और उसका
परिणाम ये कविता है,,
ये ऊनी कविता जिसे
ओढ़कर मैं इस कड़ाके की
ठंड का सामना
गले में लटकी अंगारे की अंगीठी
की तरह कर पाता हूँ,,,
जिससे निकलता हुआ
धुंआ मेरे जिस्म को ही नहीं
मेरी रूह को भी
गर्माहट पहुंचाता है,,
मुझे फिर से एक नयी
ऊर्जा प्रदान करता है,,,
कवि बरकरार रखे इन
कविताओं को बुनना
और सभी लोग इसका
लुफ्त उठाते हुए कवि को
न सही उसकी रचनाओं को
उसके भावों को उसकी
कल्पनाओं को सदियों सदियों
के लिए अमर बना दें,,,,
और जर्रा ज़र्रा बोल उठे
वाह ये थी एक
रूमानी कविता,,,,,,,,,,,
मेरी कविता
हम सब की कविता
ये रूमानी कविता।।।।।
– झलक अग्रवाल, हाथरस

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