Devendra Soni April 15, 2019

लघु कथा

आज़ादी की साँसें

आज अवकाश का दिन था।नकुल और मेहुल अपने कमरे में बैठे टीवी देख रहे थे।एक नेता जी का भाषण चल रहा था।चुनाव के जो दिन करीब आ रहे हैं।श्रोताओं की अपरम्पार भीड़ जमा थी।चिलचिलाती धूप थी।श्रोताओं के लिए छावनी की भी व्यवस्था नहीं थी।नारियां आँचल से सिर ढकी हुई थीं।कोई पुरुष टोपी लगाए हुए थे कोई रुमाल बाँधे हुए थे कोई खुले सिर तप रहे थे।किसी किसी के सिर पर गमछा बँधा हुआ था।उनमें से कोई बहुत शिक्षित प्रतीत नहीं हो रहा था।उनकी ऐसी स्थिति देखकर नकुल को बड़ा दुःख हुआ।वह मेहुल से बोला-
“अरे यार देखो तो इतनी धूप में बैठे ये लोग बहुत शिक्षित भी प्रतीत नहीं हो रहे हैं।ये भला इस लंबे चौड़े भाषण को क्या समझ रहे होंगे!
मेहुल ने व्यंगात्मक स्वर में कहा-
“आयोजन कर्ताओं को इससे क्या मतलब!इन्हें तो केवल भीड़ इकट्ठी करनी है!”
“तुम्हारे कहने का क्या मतलब!ये खुद नहीं आये हैं!भीड़ बढ़ने के लिए इन्हें जबरन लाया गया है!”
नकुल ने आश्चर्य से कहा।
“और नहीं तो क्या!जितनी भीड़ होगी उतनी अधिक तालियां बजेंगी
और उन्हें वाहवाही मिलेगी!इससे इनकी पब्लिसिटी होगी।मेहुल कहने के लिए हम आज़ाद हैं पर ये कैसी आज़ादी जिसकी कोई मर्यादा नहीं।चरित्र,व्यवहार की सीमा लांघी जा रही है और भ्रष्टाचार कालिया नाग बनकर सबको डस रहा है।”
इतने में नेता जी का भाषण समाप्त हुआ और तालियों की ध्वनि से वातावरण गूँज उठा।
नकुल ने आश्चर्य से कहा देखो जरा जिनके लिए हम दयःखि हो रहे हैं वे तो खुशी से ताली बजा रहे हैं
मेहुल ने कहा-
“वे यह सोचकर खुश होकर तालियाँ बजा रहे हैं कि वे जो गुलाम बनाकर लाये गए थे उसका समय समाप्त हुआ और अब वे आज़ादी की साँसें ले सकेंगे।”

स्व रचित
इन्दिरा तिवारी
रायपुर-छत्तीसगढ़

1 thought on “रायपुर से इंदिरा तिवारी की लघुकथा – आज़ादी की साँसें

  1. कथा में बहुत ही पैना व्यंग उकेरा है मौजूदा हालातों पर.आम जन के जीवन की विडम्बनाओं की सुन्दर तस्वीर जो मात्र भीड़ हैं.

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