Devendra Soni April 13, 2019

ख़्वाहिशों के परिन्दों को

ख़्वाहिशों के परिन्दों को,
आज मैंने आज़ाद किया है..
उम्मीदों के आँचल की उनको हवा दी है..!
कहा है उनसे ..जाओ छूलो आसमान ,
इस शितिज से उस शितिज तक..!
नया सवेरा है नये हैं अरमान ,
खिल रही है चिर परिचित मुस्कान..!
उगते सूरज की पहचान करा कर,
हर्षित मन में उल्लास जगाये..
साँझ ढले को फिर मिल जाना,
नव जीवन की तुम राह दिखाना..!!

स्वरचित रचना
प्रियंका माथुर
नई दिल्ली

1 thought on “नई दिल्ली से प्रियंका माथुर की कविता – ख़्वाहिशों के परिन्दों को

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