दतिया से जगदीश सुहाने का आलेख – श्री राम नवमी

🔴श्री राम नवमी🔴

आज श्री राम नवमी है।
प्रभु श्रीराम का प्राकट्य दिवस।
प्रभु श्रीराम– जो कण-कण में व्याप्त हैं।
प्रभु श्रीराम– जो निराकार भी हैं और नराकार भी हैं।
वे सरल हैं-“सरल सबल साहिब रघुराजू”।
वे कठिन हैं, इतने कि-“सगुन जान नहिं कोइ”।
एक झाँकी देखें।
सीता हरण हो गया है।शबरी से भेंट करके विलाप करते हुए वे एक तालाब के समीप बैठकर विश्राम कर रहे हैं।इसी समय देवगण और मुनिबृन्द उनके दर्शनार्थ वहाँ आते हैं तो देखते हैं कि:-
“बैठे परम प्रसन्न कृपाला।कहत अनुज सन कथा रसाला।”
मानस३/४१/४
वे तो प्रसन्न–नहीं, नहीं-परम प्रसन्न हैं और छोटे भाई को मीठी मीठी कथाएं सुना रहे हैं।भगवान् की स्तुति करके वे सब चले जाते हैं।
तत्काल अगली ही चौपाई में नारद जी उन्हें देख कर विशेष दुखी हो जाते हैं, क्योंकि नारद मुनि को प्रभु श्रीराम दुखी दिखाई देते हैं:-
“विरहवंत भगवंतहिं देखी।नारद मन भा सोच विशेषी” मानस३/४१/५
विचारणीय यह है कि देवगण एवं मुनिबृन्द प्रामाणिक दृष्टा हैं, उनकी दृष्टि संदिग्ध नहीं हो सकती-इन्हें श्री राम परम प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं।
नारद मुनि भी प्रामाणिक हैं, परन्तु एक ही क्षण के बाद उन्हें श्रीराम दुखी दिखाई दे रहे हैं।
तो श्री राम जी वास्तव में सुखी हैं या दु:खी?
दो विरोधी भाव एकसाथ हो नहीं सकते।
इस विरोधाभास के तीन संभावित समाधान-बिन्दु हो सकते हैं:-
१-देवता और मुनिबृन्द भगवान् के दर्शन का भाव लेकर आए हैं और भगवान् हैं “सच्चिदानंद”।इसलिए उन सबको भगवान् परम प्रसन्न दीखने ही चाहिए।
२-नारदजी उस व्यक्ति को देखने आए हैं जिसे उन्होंने”नारि विरह तुम होहु दुखारी”का श्राप दिया है।इसलिए नारदजी को श्रीराम के मुख-कमल में अपने श्राप का प्रतिबिम्ब दिखाई देना स्वाभाविक है।
३-यह प्रभु श्रीराम का ही लीला-वैशिष्ट्य है कि जो उन्हें जिस रूप में देखना चाहता है उसे वे उसी रूप में दिखाई देते हैं।
मुझे अन्तिम संभावना ही सही समाधान के ज्यादा समीप लगती है क्योंकि इसमें शेष दो संभावनाओं का अन्तर्भाव भी हो सकता है तथा भगवान् का स्वयं उद्घोष है-“ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्”।लोकमान्यता प्रसिद्ध ही है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने गोस्वामी तुलसीदास जी को श्रीराम रूप में दर्शन दिये थे।

भगवान् उसी रूप में हमें मिलते हैं जिसमें हम उन्हें देखना चाहते हैं।यह भक्ति की मधुर कल्पना नहीं है, तत्त्व की तार्किक परिणति है।अस्तित्व(परमसत्ता)”सर्व”है तो सभी रूपों में, सभी गुणों में वह प्राप्तव्य है।

प्रभु श्रीराम प्रसाद और विषाद से परे नित्यसमत्व में स्थित हैं गोस्वामी जी कहते हैं:-
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदु:खत:।
मुखाम्बजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा।।
रामचरितमानस२/२
राज्याभिषेक होने के समाचार से प्रहृष्ट नहीं, और वनवास का आदेश मिलने से विषण्ण नहीं।

लेकिन प्रभु श्रीराम के मनोभाव सुखदु:खादि के अवसरों पर हमारी तरह बदलते भी हैं।【सर्व जो हैं।】
देखिये श्रद्धेय डॉ०मोहन गुप्त का यह श्लोक:-
प्रसन्नतां या हि गताभिषेकतो
जनस्य मम्ले$थप्रियानुजार्तितः
विलोक्य धार्ष्ट्यं जलधेःक्रुधारुणां
प्रहर्षमापोपकृतैर्हनूमतः
हासं गता केवटभाषितैर्या
कलैःशुचं गृध्रगतिं निरीक्ष्य तां
मुखाम्बुजश्रीः रघुनन्दनस्य मे
सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा।
डॉ०मोहन गुप्त
१-राज्याभिषेक का समाचार सुनकर प्रसन्न होते हैं-
तेहिं अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद । सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।२/१०
२-सीताजी और लक्ष्मण के कष्ट में दु:खी होते हैं-
प्रिया के लिए-एहिं बिधि खोजत बिलपत स्वामी।
मनहुँ महा विरही अति कामी।।३/३०/१६
अनुज के लिए-बहु बिधि सोचत सोच विमोचन।
स्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।मा०६/६१/१७
३-समुद्र की अवज्ञा से क्रुद्ध होते हैं-
विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत।।५/५७
४-हनुमानजी की सेवा से प्रसन्न होकर कृतज्ञता व्यक्ति- सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।मानस५/३२/५
५-केवट की बातें सुनकर हँसते हैं-
सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहँसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।२/१००
६-जटायु की दशा देखकर शोकसंतप्त होते हैं-
जल भरि नयन कहहिं रघुराई।मा०३/३१/८
आशय यह कि साक्षात् ब्रह्म होते हुए भी श्री राम मानवीय संवेदनाओं में हमारी ही तरह हैं।

ऐसे परात्पर ब्रह्म मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम हम सब पर कृपालु रहें।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज्य काहुँहि नहिं व्यापा।।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
रहहिं सुखेन निरत श्रुति नीती।।

– जगदीश सुहाने, दतिया।

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2 Comments

  1. राम भगवन की दिव्यातिदिव्य पराम् मनोहर झांकी जिसमे
    “जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूर्ती सो देखि तैसी “

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