हाथरस से झलक अग्रवाल की कविता – मखमली लिवास

मखमली लिबास

दिन बीते उमर ढली
अपना मखमली लिबास
देखने की ख्वाइश
अचनाक् से मन में पली

आईने में जब निहारा खुद को
ठोस लगी कुछ मेरे अहं को

आँखें वही थीं
बस थोड़ा अंदर धसी थी
चमड़ी भी वही थी
बस झुर्रियों से सजी थी
बाल भी वही थे
बस सफेदी में रंगे थे
शरीर का रंग अब भी गोरा था
बस उनपे गाँठो का पहरा था
खड़ा तो था में अब भी
बस हाथ में डंडा थमा था

बचपन से जवानी
जवानी से बुढापा आ गया
गहराई में झांका तो पाया
अरे फिर से बच्चा बनने का वक्त आ गया।।

वापस लाना चाहता था मैं
उन बीते लम्हों को,,
भूत भविष्य की अग्नि में
जिनको जला दिया
वर्तमान में कभी जिया ही नहीं
इस बात का अफ़सोस कर
फिर एक लम्हा और गवां दिया।।

होश जब ये आया तो
दो पल् ध्यान लगाया
हुई खटपट कुछ अकस्मात्
आँख खोली तो देखा
काल का संदेशा आया

बोला बेटा अब बहुत हुआ
60 वर्ष कहाँ था तू खोया
व्यर्थ गवां दिया जीवन सारा
क्या एक पल् भी
अपनी रूह को संवारा??

नहीं वक़्त अब मेरे पास भी
मैं काल खुद वक़्त का मारा
चल उठ अपना लिबास बदल अब
मैला पड़ गया तेरा तन मन सारा

सांत्वना इतनी मैं देता हूँ
बच्चे का तन बच्चे का मन
वो बचपन फिर से देता हूँ,,
जी लेना हर लम्हे को अब
जो जिया नहीं इस जीवन में
बिखेर देना खुशियाँ सारी
खुशबू भर देना चितवन में।

मैं बोला रुको काल तुम
इतना तो करके जाऊँगा
नहीं दे पाया अब तलक कुछ
मगर ये अनुभव तो दे के जाऊँगा।

खुल कर हसलो खुल कर रोलो
भीतर लगे लेपो को खोलो
एक धागे से हम सब बंधे
जान् ये तुम रूह को जोड़ो।
खो जाओ इस परम सत्य में
राग द्वेष के बंधन तोड़ो।

मुझमें भी वही
तुझमें भी वही
हम सब एक हैं
और उस एक में भी वही
जी लो इस लम्हे को यारो
एक “झलक ” जी लो इस लम्हे को।

– झलक अग्रवाल, हाथरस

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