कोलकाता से अनुपमा झा की कविता – फाग

#फाग

अरी ओ सखी
लेकर आ जरा गुलाल
अरे रख परे
अपना मलाल
चल झट झटक
रख अपनी परेशानियों
को पटक
क्यूँ रही अब भी
तमतमा
चल निकाल दे
दिल मे जो भी है
जमा जमा
डाल मन की बलाओं को
होलिका के आगोश मे
जा फिर खेल रंग
पी के संग
पूरे होश ओ जोश मे
कर सार्थक
फाग के राग को
प्रेम की आग को
चल अब
और न इतरा
न पिया को तड़पा
पिया संग चहक चहक
महक महक
जरा बहक बहक
ओ सखी
न ठमक ठमक
चल अब
मटक मटक
चुड़ियों सी
खनक खनक
पिया के प्रेम मे
लौ सी दमक दमक
अरी ओ सखी
अब ले आ गुलाल
जो जिए वही तो
खेले फाग!!!

©अनुपमा झा,कोलकाता

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