सूरजपुर से अनसुईया झा की कविता – कैसे खेलूं होली

कैसे खेलू होली
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कैसे कहूं मैं ,
हैप्पी होली ,
कैसे खेलू मैं होली ,
सरहद पर देश के रक्षक ,प्रहरी
झेल रहे है गोली !
आतंक नक्सलवाद का साया
मड़रा रहा है.
पुलवामा में शहीद हुए की
चिता दहक रही है ,
उनके घर में आज भी मातम पसरा है ,
पत्नी का रंग बेरंग हो गया
बेटा रंगों को घूर रहा है ,
जो देश के ही रक्षक थे
जिससे होती थी होली
वो ही आज गोली झेल रहे है !

कैसे खेलू होली ?
संकट हरने वाले राम ,
आज तंबू पर ही पड़े है ,
जो न्याय देने वाले ही
अदालत में खड़े है !

कैसे कहूं खुश हूं ?
फूटफाथ पर देश सो रहा है ,
बच्चे कूड़े कचरे बिन रहे है ,
भूखा पेट सो रहा है !

कैसे कहूं मैं ठीक हूं ?
आज भी बलत्कार ,भ्रूण हत्या
हो रहे है ,
दहेज के लिए बेटी की हत्या हो रही है !
शिक्षित बेरोजगार मजदूर है
अनपड़ देश का नेता है.
फिर क्या उत्सव ???

अनुसुईया झा,सूरजपुर

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