जोधपुर से दीपा एम खेतावत की अभिव्यक्ति – जिंदगी की आखिरी शाम …तुमसे

एक ऐसी सच्चाई….
जिससे हर पति पत्नी रु ब रु होते हैं
बड़ी बात ये कि एक दूसरे को बखूबी निभाते भी हैं

चाहती हूँ कि आप इसे पूरा पढ़ें और
अपने जीवनसाथी के साथ पढ़ें ….✍️

“जिंदगी की आखिरी शाम …#तुमसे”

“ओओहहह…आज बिना कुछ खाये समय से पहले ही निकल गए ऑफिस.. न कुछ बोले न कहा “जा रहा हूँ..” शायद रात की बात अब तक ज़हन में चल रही थी और फिर मैंने भी तो कहाँ तवज्जो दी..सुबह से काम में लगी हूँ … मन में कुछ कुछ मेरे भी चल रहा है …जल रहा है।

हाल इतने भी बुरे नहीं होते जितने हम बना देते हैं ये सोच सोच कर कि कहाँ उसने गलती की। बन्द कमरे में अजनबी की तरह रहते हुए मुँह फेर कर सोये सोये कितनी रातें यूँ ही बीता दी हमने… इतने अजनबी हम पहले तो न थे … जब अनजान दो रिश्ते आपस में जुड़े तब भी नहीं… उस समय तो हमारी सारी कोशिशें एक दूसरे को समझने जानने और साथ निभाने की रही थी और इसी सोच पर तो दुनिया में वैवाहिक संबध लंबे समय तक टिके रहते हैं … फिर अचानक ये क्या हुआ …?? अब जबकि हमारा रिश्ता उम्र के 31 पड़ाव पार कर चुका है .. हमारे बच्चे वेल सेट होकर भी हमारे साथ ही रह रहे हैं हमने जो संस्कार उन्हें दिए हैं कितना खूबसूरती से वे हमारे साथ निबाह रहे हैं … हमारे आँखों की भाषा पढ़ कर अब समझने लगे हैं कि आज घर में शांति क्यों है या किस बात पर माहौल गरम है।
फिर …..फिर हमें क्या हो गया है ?? ऐसा नहीं है कि तुम्हें मेरी फिक्र नहीं… मेरे चाहने से पहले तुमने मेरी हर तमन्ना को पूरा किया है,घर की बाहर की जिम्मेदारियों को सही से उठाया है ,बच्चों की परवरिश में कमी न होने दी है, लोगों के बीच मेरा सम्मान बनाये रखा है और तो और मेरे जरा से उदास हो जाने पर तुमने हर बार हंसाते मनाते रहने की कोशिश की है।
जाते जाते तुम बुदबुदाते हुए तो गए थे “….तुम्हें क्या परवाह है मेरी” !! मैंने सुन लिया था पर रोका नहीं तुम्हें जानती हूँ न गुस्सा नाक पर बैठा हो तो तुम आँख भी न मिलाते हो,तुम सामने रहो या नहीं मैं सोचती रहती हूँ तुम्हारे लिए कि कितना प्यार से रखते हो तुम मुझे। परवाह होती है तुम्हारी … आँखों से दूर होते हो न तो चिंता भी बहुत रहती है …तुम्हारे बेतुके शौक तुम्हारी आदतें बनते बनते कब तुम्हारी लत बन गए हैं… अहसास है मुझे,और लत सही हो गलत हो लत तो लत ही होती है न … इंसान को जकड़ लेती है अपने शिकंजे में। बहुत बुरे भी शौक नहीं तुम्हारे … पर धीरे धीरे उनका बढ़ना हमारे दरमियाँ प्रेम को…अपनेपन को कम करता जा रहा है। मन ही मन हम दोनों ये बात जानते हैं कि … हममें से पहले कोई चला गया तो दूसरा अकेले कैसे जी पायेगा… बड़ी मुश्किल होगी। जाना तो होगा ही… पर यूँ धोखे से जाना सह न पाएंगे हम दोनों…. हाँ, धोखा ही तो …. आखिरी कुछ समय में जब बहुत गहरा साथ चाहिए हमें … अपनी अपनी जिद्द से एक दूसरे को हम तोड़ रहे हैं। हममें इतनी परिपक्वता आ गई है कि अपनी ऐंठ में रह कर खुद को साबित करने लगे हैं हम।
ये पूर्णता नहीं ये बचपना है, या यूँ समझो कि एकदूसरे की एक्स्ट्रा केअर का नतीजा है कि अब हमने खुद को हर बात से स्वतंत्र कर लिया। “तुम तुम्हारे…. मैं मेरे” ……और हमारे बीच में पसरी है अकाल चुप्पी। कब तक… और क्यों पर !!!
ऐसी कोई उलझन नहीं जिसे मिल बैठ कर सुलझाया न जा सके, ज्यूँ ज्यूँ तनाव घेरने लगगेगा हम अपनी उम्र और खो देंगे … शायद मैं बिस्तर पकड़ लूँ और तुम स्टेचर चेयर …. पर ये घुटन भरे माहौल से अब हमें बाहर निकलना होगा। एक स्वस्थ और समझदार जिंदगी शुरू की थी न हमने तो सुंदर और सफल रूप में ही इसका अंत भी करना होगा।
सुनो …..!!! बहुत सहारे की जरूरत है मुझे … तुम भी कहाँ मेरे बिन सब कर पाओगे। शाम होते होते लौट आना आज तुम अकेले, अपनी सारी शिकायतों को नज़र बन्द कर आना …. !! गलतफहमियों को कालापानी की सज़ा देकर मैं भी इस तरह तुम्हें दरवाजे पर मिलूँगी ….जैसी पहली शाम को काम से लौटते हुए तुमने मुझे देखा था …
और कहा था ….”मेरी जिंदगी की आखिरी शाम तक तुम यूँ ही मुस्कुराते हुए मिलना मुझे दरवाजे पर !!!”

– दीपा एम खेतावत, जोधपुर

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