अम्बिकापुर से आचार्य दिग्विजयसिंह तोमर की कविता – मीठी तेरी बोली

*मीठी तेरी बोली*

कही क्या फिर से कहो
मीठी तेरी बोली इतनी!
पति-प्रसन्नता की चाह
है तुम में कृष्णा कितनी ?

कहो ना कृष्णा कितनी?

पति-प्रसन्न्ता पयोधि जैसा।
आसमान में तारों जैसा।।

कही क्या फिर से कहो
मीठी तेरी बोली इतनी!

काछी कन्या कविता तेरी
तेरे तन-तमीज़ पे वारी।
प्रसन्नता की चाह कितनी
कैसे कहे कुसुमा तुम्हारी।।

कही क्या फिर से कहो
मीठी तेरी बोली इतनी!

कोमल कन्या कृष्णा पर
परिष्कृत प्यार है तेरा।
आनंद कलरव संग
कलोल करता जीवन मेरा।।

कामनाओं की पूर्ति होने पर
तृप्ति का पूर्ण विराम क्या होता!
और-और का दौर. . .
हृदय चमन पुष्पित है होता।।

कही क्या फिर से कहो
मीठी तेरी बोली इतनी।।

स्वरचित रचना,
आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर।
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