हजारीबाग से शशिबाला की कविता – ओ समुंदर !

ओ समुंदर !

देखो तुम्हारे तट की गीली रेती पर
बना रहे हैं कुछ बच्चे
अपना घर..
लहरों से कहो जरा संभल कर आएँ
पूरा बन जाने दें
उसकी हर दीवार छत खिड़कियां
छुपा कर रख लेने दें
आँखों से उतारकर सपने सलोने
बना लेने दें घेरा पूर्ण सुरक्षा का
और भर लेने दें संतुष्टि की साँस उन्हें
वे अबोध जो बना रहे हैं
लहरों की आदत से बेखबर
तट की रेती पर
अपना घर..
मैंने भी बनाया था छुटपन में ऐसा ही
एक घर थाप थापकर हाथ से
अपने ही पाँव पर
भींगी गीली रेती को
और लिख दिया था एक नाम
कहा था तुमसे कि छुपा दो
दुनिया की नजरों से
बसा लो असंख्य शंख सीपियों संग
अपने अंतःस्थल में
प्रेम ही प्रेम था बुना हुआ उसमें
कहते हैं प्रेम ही सीपी है
प्रेम ही मोती
प्रेम ही है लहर लहर पर
तभी तो अथाह है इसका वजूद
ओ समंदर !
जब आऊँ और आकर माँगूँ
तो देना आँचल भर मोती उस नाम के
लहरों के हाथ भेजकर
कि अब जरूरत नहीं दुनिया से छुपाने की
कोई भी नाम
जग जाहिर है पहले ही मेरा प्रेम…
– शशिबाला , हजारीबाग

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