दिल्ली से चेतना शर्मा की अभिव्यक्ति – सफर बंसत से पतझड़ तक का

र्शीषक-
सफर बंसत से पतझड़ तक का

बसंती बयार बहने सी लगी थी ।पतझड़ जाने को था और बसंत की नई कोपले बस फूटने को थी। जो पीले पत्ते कुछ बाकी थे पेड़ पर ।जाते-जाते भी कुछ बहुत चमकीले नए पत्तों को धूप की तपिश से बचाकर खिलने के लिए छावं दे रहे थे ।तभी एक नए पत्ते ने जो अभी कल ही फूटा था टहनी पर ने ,नीचे झांका तो पतझड़ के कारण गिर चुके पत्तों पर अफसोस मनाने लगा और सोचने लगा बेचारे कितने निष्प्राण है, मृत से, पर फिर कुछ अपने यौवन पर मुस्काया । बसंती हवा ने प्रेम से स्पर्श कर उसे और कुछ चमकदार बना दीया। और उस पीले पड़ चुके पत्ते का मन कुछ आशंकित सा हुआ ।जब बसंती हवा तेज चली।
उसने कुछ आशंकित और घबराते हुए , नए चमकीले पत्ते से कहा,-” इस हवा पर ज्यादा भरोसा ना करना है, कब तेज आंधी बन उड़ा ले जाए यह”।
पर चमकीले पत्ते ने उस पीले मुरझाए पत्ते की बात को मुंह बनाकर झुठला दिया। और अपने रूप यौवन पर इतराने लगा ।
अगले दिन जब माली आया तो उसने नीचे बिखरे उन पीले निष्प्राण ,मृत पत्तों को पेड़ की जड़ों में ही इक्ट्ठा कर दिया ।तभी किसी पथिक ने पूछा ,-“ऐसा क्यों करते हो”?
तो माली ने कहा,” इस पेड़ की पैदावार थी, इसी ही की खाद बन जाना है इसे “।
तभी यह बात सुनकर वह पीला पत्ता कुछ व्यंग्यात्मक मुस्कान से नजर भर देखता है उस हरे चमकीले पत्ते को।
बसंती बयार के चलते ही वह पीला पत्ता कुछ मुस्कुराता हुआ जमीन पर आ गिरा।
उस पीले पत्ते को गिरता देख ,हरा चमकीला पत्ता अभी भी सोच रहा था ,कि उस पीले पत्ते की मुस्कुराहट में क्यो इतनी शांति थी।उसके गिरने की आवाज मै क्यो नही सुन पा रहा हूँ।शायद आसपास बसंती हवा का शोर बहुत ज्यादा है।
और नीचे गिरते हुए वह पीला पत्ता यह सोच रहा था की शायद यह वही शांति है जो पिछले बसंत में वह बूढ़ा पीला पत्ता उसे महसूस करवाना चाहता था।

हम जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जीवन की सच्चाई को कल्पना मान बैठते है ।सबकुछ देखते भी है और समझते भी है ,फिर भी बुद्धि पर एक आवरण सा पड़ा रहता है। और हमारे बुजुर्ग हमे आईना दिखाते है तो हम या तो उनका मजाक बनाते है या उनके प्रति अपना रोष व्यक्त करते है।

चेतना शर्मा,दिल्ली
मौलिक व स्वरचित

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