सरगुजा से स्नेहलता की रचना – नमामि देवी नर्मदे

नमामि देवी नर्मदे

पावन जल की लहरें तेरी
ममतामयी लगती है
बचपन बीता जहाॅ पे मेरा
ये बात नयी सी लगती है
जब जब तेरे दर्शन मिलते
जीवन दिशा सही सी लगती है
पावन जल की लहरें तेरी
ममतामयी सी लगती है

तन मन कितनी शुद्ध तू करती
अविचल कल कल बहती रहती
पाप इकट्ठा करके मेरा
पुण्य तू मुझमे भरती रहती
जीवन की कहानी तुझ बिन
कितनी अनजानी सी लगती है
पावन जल की तेरी लहरे
ममतामयी सी लगती है

मात नर्मदे तेरा दर्शन पाकर
जीवन मेरा धन्य हुआ
मोक्षदात्री देवी छूकर तुझको
जन्म मानव भी धन्य हुआ
धन्य है माता तेरी लहरे
पार लगाती मेरे पाप
जल पी लू बूॅद भर भी
जीवन होता है निश्पाप
कृपा असीम, तेरी महिमा का
*स्नेह* का करू कैसे गुणगान
नहीं वो शब्द जो करे दे तेरी
पूरी महिमा का कविता मे बखान
बस इतना कहती हूॅ
तेरी महिमा अपरम्पार है
कितनी पावन तेरी लहरो की
ममतामयी सी धार है

स्नेहलता *स्नेह*
सरगुजा छत्तोसगढ़

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