हजारीबाग से शशिबाला की कविता – मेरे मन की मुंडेर पर

मेरे मन की मुंडेर पर

चहचहा रही है कब से
मेरे मन की मुंडेर पर
एक चिड़िया तेरी यादों की
देखती हूँ
फुर्र से उड़ती है
चुन के ले आती है
छोटा सा कोई तिनका चोंच में दबाकर
लम्हों में कैद तेरी यादों के मंजर
इन तिनकों की शक्ल में
अब जोड़कर इनको
बनाएगी बसेरा यहीं मेरे मन की मुंडेर पर
ऐसे तो भरी भरी ही
रहती हूँ हरदम
खट्टे मीठे पलों की सैकड़ों हजारों यादों से
अब ये बसेरा
कुछ और सताएगा कसक बन
नींद भरी पलकों को
सोचा उड़ा दूँ
छोटी सी एक कंकरी फेंक इसको
पर वह भूलकर चहकना
फुदकने लगी यहां से वहां तक
मेरे विचारों के आँगन में
उन्मुक्त मतवाली सी
थोड़ी सी थिरकन मेरे पाँवों में
और रुनझुन मेरे बिछुओं में
भर गई वो नन्ही सी चिड़िया
चुलबुली मखमली पंखों वाली
ले आई हूँ मुट्ठी भर दाना
बिखेर कर आँगन के कोने में
जहाँ छाँव है
जहाँ छोटी सी कलशी है
ठंढे पानी की
बैठूँगी छुपकर देखूँगी इसकी फुदकन
और सुनूँगी मूँद कर आँखें
चहकती चिड़िया की चहकन…
– शशिबाला , हजारीबाग

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