सोनीपत से भारती वशिष्ट की लघुकथा – बोलती तस्वीर

बोलती तस्वीर

सोसाइटी की तीसरी मंजिल वाले फ्लैट में एक बुजुर्ग दम्पत्ति रहने आये। अत्यधिक शांत स्वभाव की आंटीजी और रौबीले स्वभाव के अंकल जी को देखकर श्रद्धा को उन्हें जानने की उत्सुकता और बढ़ती जाती। उड़ती उड़ती खबर भी मिली थी कि वो सन्तानहीन हैं।

एक दिन मंदिर से लौटते वक्त श्रद्धा को आखिर आंटी जी से अकेले मिलने का मौका मिल ही गया। एक ही मुलाकात में वो इतनी घुल मिल गयीं कि श्रद्धा का हाथ पकड़ कर आंटी जी अपने फ्लैट में ले गईं।

घर में घुसते ही श्रद्धा की आँखें फ़टी की फ़टी रह गयी। सामने दीवार पर अंकल जी की मैडल मिलते हुए तस्वीर थी। साथ ही एक तस्वीर में गरिमामयी वर्दी पहने तीन लड़कियाँ हेलमेट हाथ में लिए अपनी महिमा शब्दों के बिना ही बयान कर रही थी। श्रद्धा की जिज्ञासा चरम पर थी। उसने जैसे ही पूछा ये कौन है आंटी जी!

पीछे से रौबीली आवाज़ का गर्व शब्दों में झलक रहा था-” ये मेरी तीनों सकुडर्न लीडर बेटियाँ हैं।”

श्रद्धा मन ही मन सोच रही थी-” फौजी की बेटियाँ तो फ़ौजी ही होंगी।”

तभी आंटीजी की मधुर आवाज़ आयी-” बेटा ये बीच वाली मेरी बेटी सौम्या है और ये गरिमा और माधवी मेरी बहुएँ हैं। मेरे बेटे अनमोल और सक्षम की पत्नियाँ।”

श्रद्धा मूक सी गौरवान्वित बुजुर्ग दम्पत्ति को देखती ही रह गयी और ससम्मान हाथ स्वयं ही उन्हें सलाम करने के लिए माथे तक पहुंच गए।

मौलिक व स्वरचित
भारती वशिष्ठ,सोनीपत

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