महासमुंद से महेश राजा की लघुकथा – गृहस्थी

लघुकथा –
गृहस्थी
पत्नी के मायके से उसके भाई,भाभी और बच्चे आने वाले थे।वे उच्च वर्ग से जुडे हुए थे।
पत्नी दो दिनो से घर की साफ सफाई और सजावट मे व्यस्त थी।सोफे के लिये नये कव्हर खरीद लिये गये थे।
शाम को वे आफिस से लौटे तो देखा कि घर का कायापलट हो गया था।उन्हें लग ही नहीं रहा था कि वे अपने घर मे है।हिचकते हुए सोफे पर बैठ गये।पत्नी पानी लेकर आयी।उनके चेहरे पर हैरानी भाव देख कर होठों मे ही मुस्कुरा ती रही।
मेहमान आये।दो दिन तक साथ रहे।समय कैसे बीत गया पता ही न चला।
फिर से वही दफ्तर…. झोला…साग सब्जी और दोस्तों के साथ चाय।
दो तीन रोज बाद,शाम को जब वे आफिस से पहुंचे. तो देखा,घर मे सब कुछ अस्त व्यस्त था।कपडे बिखरे पडे थे।मेज पर धूल की परते,किताबें सोफे पर पसरी थी।
यह सब देख कर उन्हें अपनापन लगा।एक आत्मिक सुख मिला।चारों तरफ संतुष्टी पूर्ण नजरे डालकर जूते उतारे,एक तरफ फेंके।मोजो को भी गोल गोल आकार बना कर दूर फेंका ।सोफे पर पैर पसार कर बैठे।फिर पत्नी को आवाज लगाई,भ ई ,नीलू…।कहाँ हो?जरा एक कप गरमागरम चाय तो पिलाना,मसाला डाल कर।फिर आंखे बंद कर फिल्मी नग्मा गुनगुनाने लगे।

*महेश राजा*,
वसंत 51,कालेज रोड।
महासमुंद।छत्तीसगढ़।

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