नई दिल्ली से कमल गर्ग की कविता – मार्डन युग

मार्डन युग
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कृपा बनकर जब ,
तक जीवन मे ,
रहती है ये चंद सांसे ,
अमृत की हर बूंद ,
निचोड़ ले ,
संपूर्ण आञा मे ,
रहकर के ,
तम से भरे शून्य ,
विवेक को ,
ञान सूर्य से नहला दे ,
धरा पे तेरा आना ?
रे जीव समझ ले ?
कोटी-कोटी सौभाग्य ,
तेरे ,
लालच , तम-मम,
मोह-माया का आदी होकर ,
दुर्भागी खाते ना खोल रे ,
नीज के अपने ,
खटकर्मो मे ,
अनमोलक स्वासा मत ,
रोल रे,
नटनी चलती गगन ,
डोर पर ,
ऐसा मारग खोज रे ,
माना मार्डन युग का ,
तू प्राणी ,
सतसंग समझे कानो पे ढोल रे ,
जिस दिन तेरी ,
चंद सांसे ,
हो जाऐगी पूरी रे ,
उस पल तेरे काम ,
ना आवे मार्डन युग की शक्ति रे ।।
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– कमल गर्ग,दिल्ली

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