रांची से अनिता रश्मि की नई कविता – मैं एक प्रश्नचिन्ह

मैं एक प्रश्नचिन्ह

मैं हमेशा एक प्रश्नचिन्ह की तरह
खड़ी रही समाज के माथे पर
घर परिवार पति ससुराल
सबके सामने बिछा
मात्र एक प्रश्नचिन्ह

माँ के गर्भ में थी
दादी की इच्छा ने सोनोग्राफी करवाया
जानने के लिए
गर्भस्थ मैं कौन हूँ
मैं मैं थी
दादी, पापा की बहुतेरी कोशिश
मैं वहीं अंतिम साँसें लूँ
माँ की जिद ने बचा लिया
धरा पर धरते ही पग
प्रश्न -हे भगवान, बेटी …?

माँ की वह गोद
जो मेरा स्वर्ग थी
अनुज के आते ही
छिन गयी
टुकुर-टुकुर ताकती रह गयी मैं
वह गोद का जायज़ हकदार बन गया
मैं सबकी आँखों की किरकिरी
वह सर्वस्व हो तन गया
फिर प्रश्न –
जरुरत क्या थी इसकी
बेकार… बोझ
दस लाख या बीस लाख?

मेरे कैशोर्य ने देखा
मैं चिट्ठी लिखने तक शिक्षा पा
पारंगत कहलाई
भाई को पढ़ाने-बढ़ाने में
किसी भी सीमा तक
तनिक आँच न आयी
फिर एक सवाल-
बांसभर हो गयी लंबी
कहीं पार क्यों नहीं लगती?
अपने घर जाये बोझ हटे
घर का खर्च कुछ तो घटे

उम्र जब थी सपने संजोने की
एक काली अकेली रात में
सर पर लगा कलंक का टीका
तन-मन था मैला दूसरे का
मन-तन मेरा मैला कहलाया
प्रश्न उठा
क्यों लड़की रूप में
लिया जन्म तुमने ?
लड़का होती, होते सौ खून माफ
अब कौन ब्याहेगा तुझे?

बात छिपाकर ब्याह दी गयी
सोचा, एक सही है अपना
बस यही
यही जीवन का सपना
जन्म लेते ही मुन्नी के पाया
पति भी नहीं अपना
उसकी साँसों, आसों में कोई और
देखता रहे वह जिसका सपना
मेरा वजूद प्रश्न बन बिछ गया अब
इतनी लंबी जिंदगी कोई
अविश्वास के सहारे कैसे जीये
और किस सदी तक
ज़हर का घूँट पीये ?

आज
बुढ़ापे की दहलीज़ पर
पहरेदार सा मेरा पुत्र ही
मेरी मौत की तिथियाँ गिनता है
मेरी कुछ भी कहाँ सुनता है
कहता रहता,
बुढ़िया अब भी मरती क्यों नहीं ?
और कितने दिन जीती जायेगी ?

मैं हर सदी में
समाज के माथे पर
एक प्रश्नचिन्ह की तरह
बिछी रही सदा
अट्ठारहवीं, बीसवीं, इक्कीसवीं
और कितनी सदी तक रहूँ मैं
सिर्फ एक ???
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1 सी, डी ब्लाॅक, सत्यभामा ग्रैंड, एस बी आई के पास, कुसई बस्ती, डोरंडा, राँची, झारखण्ड -834002

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