बलरामपुर से देवेश निर्मल की कविता – सैनिकों की होली

सैनिकों की होली

तुम ध्यान धरो भारतवासी
हर वर्ष यह होली आती है
हम सब तो खुशी मनाते है
और गुलाल उड़ाई जाती है
पर उनका अहोभाग्य देखो
सीमा पर पर्व मनाते हैं
नकली रंगो से खेलते हैं
वह असली रंग बहाते हैं
जब घर में बच्चा पूँछता है!
कि पापा क्यों नहीं आए हैं
सबके पापा पिचकारी लाए
मेरे पापा क्यों न लाए हैं ?
इतना जब सुनती माँ उनकी
तब मम्मी धैर्य दिलाती है
छुट्टी ना मिले इस वर्ष उन्हें
इसलिए वह घर ना आए हैं
स्वरचित
कवि देवेश निर्मल
बलरामपुर उत्तरप्रदेश

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